The Jammu and Kashmir Issue

By Hemant Kumar|Updated : December 26th, 2019

जम्‍मू और कश्‍मीर का इतिहास

  • कश्मीर और आसपास के क्षेत्र अलग-अलग समय में अलग-अलग साम्राज्यों का हिस्सा थे।
  • 1000 ईसा पश्‍चात् से पहले, कश्मीर हिंदू और बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
  • हिंदू वंश ने 1339 तक राज्य पर शासन किया, जिसे बाद में शाह मीर ने मुस्लिम शासन द्वारा प्रतिस्थापित किया। वह कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक बना। कुछ शताब्दियों के बाद शाह मीर वंश को अकबर महान द्वारा मुग़ल राजवंश ने प्रतिस्‍थापित किया।
  • 1587 में कश्मीर पर विजय प्राप्त करने के बाद, अकबर ने इसे मुगल साम्राज्य के एक भाग के रूप में शामिल किया।
  • बाद में 1752 में, कश्मीर पर अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली का कब्जा था जिसने 1819 तक राज्य पर शासन किया जब सिक्‍ख शासक रणजीत सिंह ने राज्य पर कब्‍जा कर लिया और मुस्लिम शासन को समाप्त कर दिया।
  • 1846 में प्रथम एंग्लो-सिक्‍ख युद्ध में अंग्रेजों द्वारा पराजित होने तक सिक्‍खों ने राज्य पर शासन किया।
  • 1846 से 1947 तक, कश्मीर, जमवाल राजपूत डोगरा राजवंश द्वारा शासित ब्रिटिश साम्राज्य की एक रियासत रहा।

महत्‍वपूर्ण तथ्‍य

  • विभाजन के समय, जम्‍मू एवं कश्‍मीर एक रियासत थी और उसके पास भारत में शामिल होने या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प था।
  • जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह ने तुरंत विकल्प का चयन नहीं किया तथा पाकिस्तान और भारत दोनों के लिए एक स्थायी समझौते का प्रस्ताव रखा।
  • इस बीच, अक्टूबर 1947 में, पाकिस्तान ने कश्मीर में उन सैनिकों और जनजातियों की एक सेना के साथ हस्तक्षेप किया, जिनके पास आधुनिक हथियार थे।
  • महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और 26 अक्टूबर, 1947 को भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के एक 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर किए, जिसके अनुसार भारतीय क्षेत्राधिकार संचार, बाहरी मामलों और रक्षा तक विस्तारित होगा। 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर करने के बाद, भारतीय सैनिकों को जम्मू-कश्मीर राज्य में एयरलिफ्ट किया गया और वे पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के साथ लड़े और उन्हें वापस लौटा दिया।
  • 5 मार्च, 1948 को प्रधानमंत्री के रूप में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ एक लोकप्रिय अंतरिम सरकार का गठन किया गया था।
  • 1951 में, राज्य विधानसभा का गठन किया गया था। दिल्ली समझौते पर हस्ताक्षर करके जम्मू-कश्मीर राज्य को एक विशेष स्थान दिया गया था, यह समझौता भारतीय संवैधानिक ढांचे के तहत भारत और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्रियों के बीच था।
  • जम्मू और कश्मीर विधानसभा ने 1954 में भारत के संघ राज्य में प्रवेश की पुष्टि की, और बाद में, राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के तहत संविधान आदेश जारी किया जिसमें कुछ संशोधन और अपवादों के साथ केंद्रीय संविधान को जम्मु कशमीर राज्‍य में लाया गया।  
  • इस प्रकार, जम्मू और कश्मीर भारत संघ का अभिन्न अंग बन गया। हालाँकि, अनुच्छेद 370 के प्रावधान बाद के वर्षों में विवाद की जड़ बन गए।
  • अनुच्छेद 370 के तहत, जिसे एक अस्थायी प्रावधान के रूप में भारतीय संविधान में शामिल किया गया था, रक्षा, वित्त, विदेशी मामले और संचार को छोड़कर अन्य सभी मामलों में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया।
  • भारत की संसद को अन्य सभी कानूनों को लागू करने के लिए राज्य सरकार के अनुमोदन की आवश्यकता होती है।

परिग्रहण के बाद जम्मू-कश्मीर

  • परिग्रहण के समय, कश्मीर दो भागों में विभाजित हो गया। एक हिस्से पर भारत का कब्‍जा था, और दूसरे हिस्से पर पाकिस्तान का कब्जा था।
  • पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को अस्थिर करने के लिए आतंकवादियों को धन, हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति की। इसने भारत विरोधी प्रदर्शनों को तीव्र करने हेतु हर संभव प्रयास किया जिसके कारण घाटी को कईं बार कर्फ्यू का सामना करना पड़ा।
  • क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता और अशांति के कारण, आतंकवादी गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हुई और पूरी घाटी में हिंसा फैल गई।
  • हिंदुओं सहित कईं समुदायों पर हमला किया गया और उन्हें राज्य छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।
  • राज्य में शांति बनाए रखने के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा कईं कदम उठाए गए। हालांकि, अलगाववाद, राजनीतिक अस्थिरता और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण, राज्य अभी तक परेशानी में रहा।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019

  • राज्य को स्थिर करने और जम्‍मू-कश्‍मीर के लोगों को एक बेहतर प्रशासन प्रदान करने के लिए, भारत सरकार ने जम्‍मू-कश्‍मीर पुनर्गठन विधेयक, 2019 पारित किया, जो संसद के दोनों सदनों में पारित होने और राष्ट्रपति के अनुसमर्थन के बाद एक अधिनियम बन गया।
  • यह अधिनियम जम्मू और कश्मीर राज्य का पुनर्गठन दो केंद्रशासित प्रदेशों में करता है, एक केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर है और दूसरा केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख है।
  • केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में कारगिल और लेह जिले शामिल होंगे, तथा जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में जम्मू और कश्मीर के अविभाजित राज्य के शेष क्षेत्र शामिल होंगे।
  • वे केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के लिए एक विधायक का प्रावधान करते हैं। हालांकि, इसने अपनी कम आबादी के कारण केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लिए विधायक का कोई प्रावधान नहीं किया।
    • जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश को सीधे उपराज्यपाल के रूप में नियुक्त एक प्रशासक के माध्यम से सीधे राष्‍ट्रपति द्वारा प्रशासित किया जाएगा।
    • केंद्र शासित प्रदेश जम्‍मू-कश्‍मीर में मंत्रिपरिषद होगी जिसके सदस्‍यों की संख्‍या विधानसभा के कुल सदस्‍यों की संख्या के 10% से अधिक नहीं होगा।
    • परिषद उन सभी मामलों पर उपराज्यपाल को सलाह देगी, जिन पर विधानसभा के पास कानून बनाने की शक्तियां हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री, उपराज्यपाल को परिषद के सभी निर्णयों के संदर्भ में बताएंगे।
    • जम्मू-कश्मीर का उच्च न्यायालय जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सामान्य उच्च न्यायालय होगा।

जम्मू-कश्मीर के वर्तमान मुद्दे

  • जम्मू और कश्मीर के लोगों के बुनियादी अधिकारों की बहाली - वर्तमान में, जम्मू-कश्मीर के लोग घाटी में किसी भी असामान्य घटना को नियंत्रित करने के लिए निरंतर निगरानी में हैं। हालांकि, नागरिकों के मूल अधिकारों को जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए।
  • संचार सुविधा का अभाव - सरकार को घाटी में संचार सुविधा को बहाल करना अभी शेष है। सरकार को जल्द से जल्द इसे बहाल करना चाहिए।
  • संसाधनों का विभाजन - जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केन्द्र शासित प्रदेशों के बीच जनशक्ति और भौतिक संसाधनों का विभाजन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
  • कानून और व्यवस्था के मुद्दे - घाटी अभी भी क्षेत्र में विभिन्न अलगाववादी नेताओं के कारण कानून और व्यवस्था के मुद्दों का सामना कर रही है।
  • अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव – जम्‍मू-कश्‍मीर के केंद्रशासित प्रदेश में अभी भी अपनी आबादी के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं नहीं हैं।
  • लोकतांत्रिक चुनावों के लिए प्रावधानों का अभाव - क्षेत्र में हाल ही के ब्लॉक विकास परिषद चुनावों से पता चला है कि एक नए नेतृत्व का निर्माण करना सरकार के लिए आसान कार्य नहीं होगा।
  • अलगाववादी नेताओं का मुद्दा – जम्‍मू एव कश्‍मीर के केंद्र शासित प्रदेश में अलगाववादी नेताओं की एक लंबी सूची है जो पाकिस्तान में अन्‍यदेशीय हैं। वे क्षेत्र को हमेशा परेशान करने का प्रयास करते हैं।
  • जम्मू-कश्मीर के लोगों को मुख्यधारा में लाने की सरकार की योजनाओं का अभी तक पता नहीं चला है।

आगे का रास्‍ता

  • नागरिकों के मूल अधिकारों को जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए।
  • सरकार को घाटी में संचार सुविधा को जल्द से जल्द बहाल करना चाहिए।
  • सरकारी तंत्र के समुचित कार्य और क्षेत्र के लोगों के कल्याण के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
  • कानून और व्यवस्था के मुद्दों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए, और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
  • अलगाववादी नेताओं को हिरासत में रखने की आवश्‍यकता है और उन्हें देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने की आवश्यकता है।
  • सरकार को लोगों को भविष्‍य में प्राप्‍त होने वाले लाभों के संदर्भ में जागरूक करने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।
  • सरकार को स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।
  • जम्मू-कश्मीर के लोगों को मुख्यधारा के विकास में शामिल करने के लिए सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और देश के लोगों द्वारा सभी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।   

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