CTET और TET परीक्षा: बाल विकास के विविध पहलू पर स्टडी नोट्स

By Ashish Kumar|Updated : June 27th, 2021

In this article, we should read related to the Development & Its Aspects and its relation to learning Important for the CTET Paper-1 & 2. Development is a process of internal and external growth of a child and the emergence or differentiation of his capabilities. It could also be understood as the function of maturity and his interaction with the environment.

 

विकास के विविध पहलू:

1. शारीरिक पहलू:- शारीरिक वृद्धि एवं विकास किसी व्यक्ति  के भावनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है। यह मूल रूप से बच्चे की ऊँचाई, वजन  एवं शरीर के विकास से संबंधित है। विकास की दर प्रत्येक व्यक्ति में उसका/उसकी आयु वर्ग के आधार पर अलग-अलग होता हे। प्राथमिक समूह (6-9 वर्ष) के बच्चे मंद गति से बढ़ते है। दूसरी ओर, उच्च प्राथमिक छात्र, अपने से युवा छात्रों की तुलना में औसतन अधिक स्वस्थ होते हैं। उनकी थकान एवं रोग के प्रति प्रतिरोधकता अपेक्षाकृत अधिक होती हैं। अब, जब हम माध्यमिक एवं सीनियर सेकण्डरी स्कूल के बच्चों की बात करते हैं, उनकी किशोरावस्था यौवन के साथ शुरू होती है। आरंभिक चरण में परिवर्तन तेज गति से होता है, मध्य चरण में यह व्यवहार के पैटर्न की अपेक्षा स्थिर होता है और बाद का चरण जिम्मेदारियों एवं विकल्पों की तैयारियों से पहचाने जाते हैं जो वे अपने कैरियर आदि में बनाते हैं।1       

2. मानसिक या संज्ञानात्मक विकासः- अनुभूति का अर्थ है- जानना, अनुभूति करना या समझना। अतः इसका अर्थ होगा समय के दरम्यान जानने की क्षमता एवं वस्तुओं को समझने की क्षमता को विकसित करना। अनुभूति भी किसी की अपनी कल्पना शक्ति एवं तर्क शक्ति के आधार पर मानसिक छवियों को निर्मित करने की क्षमता शामिल करता है। इन मानसिक छवियों का निर्माण भी व्यक्ति द्वारा अपने आस-पास जाँच के बाद बनता है। इस प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति में अवलोकन की अनोखी प्रक्रिया उनकी सोच पर आधारित उनकी कल्पना के अनोखे मॉडल के रूप होती है। यही वह तरीका है कि शिक्षार्थी अपने आस-पास की दुनिया के बारे में कोशिश करता है।       

3. भावनात्मक:- सभी भावनाएँ किसी व्यक्ति के जीवन में समायोजन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनमें से एक भावनात्मक पहलू है। भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया करने की क्षमता तो एक नवजात शिशु में भी होती है। भावनाओं के भिन्न-भिन्न प्रकार होते हैं जिसे, कोई व्यक्ति अपने जीवन के भिन्न-भिन्न चरणों में प्रदर्शित करता है। हर्ष, गुस्सा, डर, चिंता, इर्ष्या, खुशी, खिन्नता एवं जिज्ञासा उनमें से कुछ हैं। बचपन की चरण से परिपक्वता तक, किशोरावस्था एक ऐसा चरण है जिसमें भावनाओं को अपने चरम पर देखा जा सकता है। कई किशोर लगातार एक काल्पनिक दर्शक को बना रहे हैं या प्रतिक्रिया कर रहे हैं। वे दर्पण के सामने घंटों बिताते हैं और सोचते हैं कि वह अन्य की आँखों में कैसे दिखते हैं। वे सामान्यतः वास्तविता से परे कल्पना की दुनिया में जीते हैं।       

4. भाषा का विकासः- शब्द संवाद मानव जाति के अस्तित्व में आने के तुरन्त बाद आया। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भाषा ही एकमात्र ऐसा साधन है जो मानवों को अन्य सजीवों से विभक्त करता है। इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि भाषा अनेक व्यक्तियों से संवाद करने के लिये एक कड़ी का कार्य करता है तथा हम अपनी अवस्थाओं, अनुभवों एवं  सोच के साथ-साथ अपने विचार तथा अवधारणा को व्यक्त कर सकते हैं। समय गुजरने के साथ-साथ, कई तकनीक विकसित हुए जिससे संवाद की विधियाँ भी विकसित हुई। यह एक कोड है जिसका उपयोग हम सभी संवाद को अन्य तक व्यक्त करने के लिये करते हैं। यह मुँह के शब्द द्वारा एक संवाद है। यह मानसिक संकाय या मुखर संवाद की शक्ति है। यह ध्वनियों, इशारों, लक्षणों या चिह्नों के उपयोग से विचारों एवं अनुभवों से संवाद स्थापित करने की एक प्रणाली है। जैसा कि अब तक हमने जाना कि भाषा मनुष्यों के लिए कुछ विशिष्ट है।

5. नैतिक या मनोबल विकासः- यह मूलतः नैतिक मूल्यों तथा मानव मूल्यों के ज्ञान को विकसित करने एवं प्राप्त करने की ओर इंगित करता है। वैज्ञानिक विकास होने के साथ ही ईश्वर में विश्वास गायब हो रहा है। अतीत में लोग अपराध करने से डरते थे क्योंकि ऐसा मानना था कि सर्वशक्तिमान हमें हमारे पाप के लिये दंडित करेंगे। ऐसा मत मानिये कि जो अपराध करता है, वह अपराधी है। हमें अवश्य सोचना चाहिए कि जाने या अनजाने, हम सभी कभी-न-कभी कुछ प्राप्ति के लिए या आनंद के लिए अपराध करते हैं। कोई बच्चा केवल परिपक्वता के बाद या अनुभूति के निश्चित स्तर प्राप्त करने के बाद ही नैतिक रूप से कार्य करता है। इसके आलावा, आज के समय में पेशेवर तथा वैयक्तिक दोनों स्तर पर अपने बारे में जानने एवं बहुमूल्य शिक्षा की बहुत जरूरत है। 

शिक्षण के संबंध में विकास:

जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि विकास वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जन्म के समय से शुरू होता है और अंत तक जारी रहता है। कोई व्यक्ति या जीव, किसी न किसी चीज से घिरा है या र्प्यावरण के अन्य प्रकार चाहे वह परिवेश, सहकर्मी, परिवार या कार्य-स्थल हो तथा उनके कार्यों को ये बाहरी कारक प्रेरित करते हैं। ऐसी सभी क्रिया-प्रतिक्रिया वाले व्यवहार को व्यक्ति में परिवर्तन शामिल होता है तथा इसी प्रकार के परिवर्तन को ‘शिक्षण’ कहा जाता है। शिक्षण एक निरंतर प्रक्रिया है तथा व्यक्ति जीवन के विभिन्न चरणों में भिन्न-भिन्न चीजें सीखता रहता है। किसी व्यक्ति में जो परिवर्तन न होता है वह इरादतन या अनजाने में भी हो सकता। शिक्षण तथा विकास के साथ-साथ मुख्य क्षेत्रों में कौशल, ज्ञान तथा अनुभव आते हैं जो बच्चों के लिए उपयुक्त होते हैं क्योंकि उनमें वृद्धि, शिक्षण एवं विकास भी होते हैं। जिन मुख्य क्षेत्रों में उन्हें उत्कृष्टता की जरूरत होती है वे हैं-संवाद एवं साक्षरता, संसारिक तथ्यों को समझना, रचनात्मक विकास, व्यक्तिगत, सामाजिक, भावनात्मक एवं शारीरिक विकास के साथ-साथ समस्या हल करने की क्षमता। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षण तथा विकास दोनों साथ-साथ चले तथा साथ-साथ बढ़े।

 

 

 

Thanks!

Sahi Prep hai toh Life Set hai!

byjusexamprep

 

Comments

write a comment
Load Previous Comments
Rashmi Sinha

Rashmi SinhaApr 24, 2021

Watch this..so easily explained Fraction Part 1(Introduction to fraction), Types of fractions ,Proper and Improper fraction.
Vishnu

VishnuMay 9, 2021

Notes Hindi me nhi mil sakti hai
Madhu Kumar

Madhu KumarJun 27, 2021

VB p Dr we
Sonam

SonamJun 28, 2021

Ur notes r awesome👍😊
Reeta

ReetaJun 28, 2021

Tgt krna h kaise kre
Pavitra B Pavi
Easy to read
Yunus Kalandar
Hindi me app laye sir
Kalpna Tyagi
Sir plz question hindi m do
Jaya

JayaApr 23, 2022

Hindi m kyu nhi notes ho rhi

FAQs

  • The weightage of CDP Section in the CTET Paper 1 & 2 - 30 Marks.

    • Physical aspect: - Physical growth and development refer to the psychomotor changes of an individual.
    • It is basically related to the growth of a child’s height, weight, and physique.
    • The rate of growth is different in every individual depending upon his/her age group.
    • Children belonging to the elementary group (6-9yrs) tend to grow at a slow pace.
    • On the other hand, upper primary students are, on average healthier than those younger than them.
    • Their resistance to fatigue and disease is also more.
    • Mental or Cognitive development: - The meaning of cognition is to know, perceive or comprehend. Hence, it would mean the development of the capability of knowing and understanding things over time, again in interaction with an environment.
    • Cognition also involves the ability to construct mental images based on one’s own imaginations and reasoning.
    • These mental images are also constructed by an individual after examining the surroundings around him/her.
    • Thus, every individual has a unique model of his imagination based on his understanding of the unique process of observation.
    • This is how a learner tries to learn about the world around him.
    • Ethical or Moral development: - It basically refers to the development and attaining knowledge of moral values and human ethics.
    • With scientific development, faith in God is vanishing.
    • In the past, people were afraid of doing crime due to fear of Almighty because it was thought that He will punish us for our sins.
    • Do not consider that anybody who has committed a crime, is a criminal.
    • We must understand that knowingly or unknowingly, we all commit the crime once in a while for a certain gain or pleasure.
    • A child can only act morally unless he has attained a certain level of maturity or cognition.
    • Moreover, in today’s time, there is a great need for self-exploration in order to know about one’s self and a need for value education both at professional as well as personal level.

Follow us for latest updates