Day 13: Study Notes पाश्चात्य काव्यशास्त्र , Part 4

By Sakshi Ojha|Updated : August 1st, 2021

यूजीसी नेट परीक्षा के पेपर -2 हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण विषयों में से एक है 'पाश्चात्य काव्यशास्त्र'। इस विषय की प्रभावी तैयारी के लिए, यहां यूजीसी नेट पेपर- 2 के लिए पाश्चात्य काव्यशास्त्र के आवश्यक नोट्स कई भागों में उपलब्ध कराए जाएंगे। इस लेख में पाश्चात्य काव्यशास्त्र, रूसी रूपवाद, नई समीक्षा, फंतासी, मिथक के नोट्स साझा किये जा रहे हैं।  जो छात्र UGC NET 2021 की परीक्षा देने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए ये नोट्स प्रभावकारी साबित होंगे। 

UGC NET Study Notes Paper 2, Hindi Literature पाश्चात्य काव्यशास्त्र , Part 4

रूसी रूपवाद : 

  • रूपवाद शब्द हिंदी के ‘फोर्मलिज़्म’ (Formalism) का हिंदी पर्याय है।  इसका प्रादुर्भाव रूस में हुआ, इसलिए इसे ‘रूसी रूपवाद’ कहते हैं। रूपवाद एक प्रकार का कलावादी आंदोलन है, जो बीसवीं सदी के दूसरे दशक में शुरू हुआ। रचना में सामाजिक मूल्य संदेश अथवा कथ्य की तुलना में रूप और तकनीक पर अधिक बल देने के कारण इस आंदोलन को रूपवाद कहते हैं। इस आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों में बोरिस इकेनबाम (Boris Eichenbaum), विक्टर श्क्लोवस्की (Victor Shklovsky) और रोमन जेकोब्सन (Roman Jakabson) प्रमुख हैं।
  • रूपवादी पूरा बल भाषा पर देते हैं। साहित्य की भाषा, भाषा का चयनित और उदात्त रूप होता है, क्योंकि रचना में इनकी दृष्टि में रचनाकार के दृष्टिकोण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है उसकी भाषा की संरचना। इनके अनुसार, भाषा एक स्वायत्त इकाई है, जिसका विश्लेषण व विवेचन रचना को नए ढंग से परखने की बुद्धि प्रदान करता है। 
  • रूपवादियों के दो केन्द्र रहे। हैं- मास्को और पिट्सबर्ग। मास्को में 'भाषिकी' के केन्द्र की स्थापना 1915 ई. में हुई थी और पिट्सबर्ग में 1916 ई. में। इस केन्द्र से जुड़े सदस्य मुख्यतः भाषाविद् थे। 
  • रूपवादी कलाकार को एक कारीगर या शिल्पी के रूप में देखते हैं। रूपवादी यह मानता है कि कविता सबसे पहले तकनीक है और तकनीक पूरी रूप रचना है, मात्र पद्धति नहीं। कवि जीवन के यथार्थ को शब्द संघटना के माध्यम से एक सुन्दर कविता का रूप दे देता है। जीवन यथार्थ कविता में समाहित है। उसका पृथक् अस्तित्व नहीं रह जाता। कविता अपनी पूर्णता में भाषिक संरचना ही है। पाठक पर प्रभाव इसी संरचना का पड़ता है, इससे होते हुए वह कवि की अनुभूति और उसमें स्पन्दित जीवन यथार्थ तक पहुँचता है।
  • रूसी रूपवाद के पुरोधा विक्टर श्क्लोवस्की ने कहा था- "कला हमेशा जिन्दगी से मुक्त होती है। इसका ध्वज शहर की चारदीवारी पर फहराते हुए झण्डे के रंग को प्रतिबिम्बित नहीं करता। उनका निश्चित मत था कि—“कला-रूपों का विवेचन कला-नियमों द्वारा ही होना चाहिए।"
  • नई समीक्षा, शैली विज्ञान और संरचनावाद आदि सभी समीक्षा पद्धति एक प्रकार से रूपवादी ही मानी जाएँगी।

नई समीक्षा :

  • नई समीक्षा कोई नयी समीक्षा सिद्धांत प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि वह एक कलावादी आंदोलन के समान, एक आंदोलन है - जप कलावाद की ही एक शाखा है , जिसमें किसी भी कृति की समीक्षा, कृति के आधार पर ही किये जाने का आग्रह है।  इसका जन्म साहित्येतर मूल्यों (समाजशास्त्र, धर्म, दर्शन, विज्ञान आदि) के आधार पर काव्य का मूल्यांकन करने के विरोध में हुआ।  
  • नई समीक्षा जिन आधारभूत बातों पर बल देती है, वे निम्नलिखित हैं- 
  1.  काव्य भाषिक संरचना मात्र है, इसलिए भाषा के सर्जनात्मक तत्त्वों का विश्लेषण ही समीक्षा का मुख्य धर्म है। 
  2. ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय दार्शनिक एवं मनोविश्लेषणवादी समीक्षाएँ अनावश्यक एवं अप्रासंगिक है।
  3.  सम्प्रेषण एवं आस्वाद के प्रश्न पर विचार तथा मूल्यांकन का प्रयत्न आवश्यक नहीं है। 
  4. रचना की आन्तरिक संगति और संश्लिष्ट विधान के विवेचन विश्लेषण के लिए, उसका गहन पाठ नितान्त आवश्यक है।
  • पाश्चात्य समीक्षक प्रीचर्ड ने 'क्रिटिसिज्म इन अमेरिका' में नई समीक्षा के योगदान को इस प्रकार रखा है- "नए समीक्षकों के अधिकांश योगदान का निश्चयात्मक मूल्यांकन तो कुछ समय बाद ही हो सकेगा परन्तु यह स्पष्ट है कि भाषिक अभिव्यंजना पर बल देने से कविता के अध्ययन को लाभ पहुंचा है। उन्होंने जो अन्धाधुंध स्थापनाएँ की हैं, उनके कारण विरोधियों में लोहा लेने की प्रवृत्ति जगी और इस तरह साहित्य के अध्ययन में उन्होंने नए प्राण फूँक दिए। विगत वर्षों में नए समीक्षकों के आत्मपर्यालोचन से और इस प्रकार के संकेतों से कि वे अपने अध्ययन को व्यापक बनाने के लिए अधिकाधिक तैयार हैं, आशा बँधती है।"
  • नई समीक्षा अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का वहन करने के कारण अतिवाद का शिकार हो गई। क्लींथ बुक्स जैसे समीक्षक ने कहा कि, “कविता के तनावों और संघटनों को समझने के लिए हमें कविता के बाहर जाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।” 
  • इलियट ने नई समीक्षा के सिद्धान्तकारों को 'नींबू निचोड़' आलोचक कहकर कटघरे में खड़ा कर दिया। आर. एस. क्रेन जैसे आलोचकों ने रूप-रचना केन्द्रित दृष्टि और प्रतिमान को अधूरा बताया। 
  •  1950 के अन्तिम दशक तक काव्य या रचना को जाँचने के लिए समाजशास्त्रीय अध्ययन का दबाव बढ़ने लगा। ऐसी स्थिति में नई समीक्षा की सीमा की ओर परवर्ती आलोचकों ने ध्यान आकृष्ट कराया।

मिथक :

  • 'मिथक' शब्द अंग्रेजी के 'मिथ' (Myth) शब्द से लिया गया है और उसका हिन्दी प्रतिरूप बन गया है। 'मिथ' शब्द का उद्भव यूनानी शब्द 'मिथॉस' (Mythos) से हुआ है, जिसका अर्थ होता है 'मुंह से निकला हुआ'। अत: उसका सम्बन्ध 'मौखिक कथा' से जुड़ गया, क्योंकि कथा भी सुनी सुनाई होती थी।
  •  हिन्दी में 'मिथक' के लिए 'पुरावृत्त', 'पुराकथा', 'कल्पकथा', 'देवकथा', 'धर्मकथा', 'पुराणकथा', 'पुराख्यान' आदि अनेक शब्द प्रयुक्त होते रहे हैं। स्पष्ट है कि इनसे 'मिथ' के पूरे अर्थ का सम्प्रेषण नहीं हो पाता। इन प्रतिशब्दों में या तो अव्याप्ति दोष है या अतिव्याप्ति। इसलिए हिन्दी में भी 'मिथक' शब्द का प्रयोग ही समीचीन है।
  • डॉ. नगेन्द्र ने मिथक को परिभाषित करते हुए लिखा है— सामान्य रूप से मिथक का अर्थ है ऐसी परम्परागत कथा, जिसका सम्बन्ध अतिप्राकृत घटनाओं और भावों से होता है।" मिथक मूलत: आदिम मानव के समष्टि-मन की सृष्टि है, जिसमे चेतन की अपेक्षा अचेतन प्रक्रिया का प्राधान्य होता है। 
  • ईमाइल दुर्खीम (Emile Durkheim, 1858-1917) तथा अन्य समाजशास्त्रियों ने माना है कि मिथक सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण तथा संचालन के लिए गढ़े गए हैं।
  • मनोविज्ञान तथा मनोविश्लेषण में मिथकों केअध्यययन को बहुत महत्व दिया है।  इस सन्दर्भ में जुंग और फ्रायड के सिद्धांतों में कुछ अंतर है, पर आगे मिथक सम्बन्धी विवेचनमे जुंग के मत को अधिक मान्यता मिली।  उनके अनुसार “ मिथक का जन्म व्यक्ति में नहीं , बल्कि समूह के मानस में होता है , वह भी चेतन नहीं अचेतन मन में। 

फंतासी या फैंटेसी : 

  •   'फैन्टेसी' शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द 'फैन्टेसिया' से हुई है, जिसका अर्थ है अवास्तव या अमूर्त को दृश्य बनाना।
  •  'विश्व साहित्य कोश' में फैन्टेसी को परिभाषित करते हुए कहा गया है- "फैन्टेसी की क्रियाशीलता में ऐसे वातावरण या चरित्र उपस्थित होते हैं, जो मनुष्य जीवन की सामान्य परिस्थितियों में असम्भव माने जाते हैं....फैन्टेसी में भौतिक शास्त्र के नियमों की सीमा टूट जाती है, पशु या मानव जीवन का अन्तर मिट जाता है, मनुष्य स्वभाव की आधारशिला डगमगा जाती है और काल्पनिक जीव समस्त काल्पनिक मूल्यों को अव्यवस्थित कर देते हैं- विचित्र और अमानवीय तत्त्वों से युक्त प्रत्येक कार्य फैन्टेसी की सीमा में नहीं आता।”
  • 'फैन्टेसी' मनोविज्ञान का शब्द है। इसका सम्बन्ध स्वप्न और अवचेतन मन में घटित होने वाली घटनाओं की विघटित और बेतरतीब बिम्बावलियाँ से है। साहित्य या काव्य में यह एक तकनीक के रूप में प्रयुक्त की जाती है। प्रायः लम्बी कविताओं में कैनवास की व्यापकता को समेटने और उनकी गति में त्वरा पैदा करने के लिए रचनाकार फैन्टेसी का सहारा लेते हैं।

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हमें आशा है कि आप सभी UGC NET परीक्षा 2021 के लिए पेपर -2 हिंदी, पाश्चात्य काव्यशास्त्र  से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु समझ गए होंगे। 

Thank you

Team gradeup.

Sahi Prep Hai To Life Set Hai 

Posted by:

Sakshi OjhaSakshi OjhaMember since Mar 2021
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Sweta Kumari
Thanku😊😊

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