Study Notes Paper-II Geography: Geomorphic Processes

By Mohit Choudhary|Updated : March 17th, 2022

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

पृथ्वी के वायुमंडल में उत्पन्न होने वाले बाह्य बलों और पृथ्वी सतह के अंदर उत्पन्न होने वाले आंतरिक बलों का पृथ्वी की सतह पर निरंतर दाब पड़ता है। इन बाह्य बलों को बहिर्जनिक बल तथा आंतरिक बलों को अंतर्जनित बल कहते हैं। बहिर्जनित बलों की क्रियाओं के फलस्वरूप धरातल पर उच्चावचों/पर्वतों का अपक्षय होता है तथा अंतर्जनिक बलों की क्रियाओं के फलस्वरूप घाटियों/गर्तों का उत्थान होता है।

भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ : अंतर्जनित और बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ

 

भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Geo-morphic Processes):-

धरातल के पदार्थों पर अंतर्जनित एवं बहिर्जनिक बलों द्वारा भौतिक दबाव और रासायनिक क्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास में परिवर्तन को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। भू-आकृतिक कारक वे गतिशील माध्यम हैं जो धरातल से पदार्थों को हटाता, ले जाता और निक्षेपित करता है।

अंतर्जनित प्रक्रिया (Endogenic Process):-

पृथ्वी के गर्भ से रेडियोधर्मिता, घूर्णन एवं ज्वारीय घर्षण और पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़ी ऊष्मा के कारण निकलने वाली ऊर्जा, अंतर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के पीछे मुख्य बल है। ज्वालामुखीयता और पटल विरूपण दो प्रमुख अंतर्जनित प्रक्रियाएँ हैं।

पटल विरूपण (Diastrophism):-

भू-पर्पटी को संचलित, उत्थान अथवा पृथ्वी की भू-पर्पटी के भागों का निर्माण करना पटल विरूपण के अंतर्गत आता है। इसमें शामिल है:

  • ओरोजेनिक प्रक्रियाएँ : पर्वत निर्माण
  • एपिरोजेनिक प्रक्रियाएँ : क्रस्ट का उत्थान (महाद्वीपीय निर्माण प्रक्रिया)
  • भूकंप
  • प्लेट विवर्तनिकी

पर्वत निर्माण (Mountain Building):

  1. वलित पर्वत (Fold Mountain): वलित पर्वत वे पर्वत हैं जो भू-पर्पटी के ऊपरी सतह की पर्तों के मुड़ने के कारण निर्मित होते हैं। जब दो टेक्टोनिक प्लेट किसी अभिसारी प्लेट सीमा पर एकदूसरे की ओर बढ़ती हैं, तो इन पर्वतों का निर्माण होता है। उदाहरण: आल्पस, हिमालय, जुरा पर्वत, जागरोस, एप्लेशियन, रॉकी, एंडीज़ आदि। इनका ज्वालामुखी क्रिया से निकट का संबंध है और ये खनिज संसाधनों के समृद्ध स्रोत हैं।
  2. ब्लॉक पर्वत (Block Mountain):- ब्लॉक पर्वतों का निर्माण पृथ्वी के अंतर्जनिक बलों द्वारा उत्पन्न खिंचाव एवं दबाव बलों के कारण भ्रंश के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण : हंसरक पर्वत, राइनलैंड का वोस्जस और ब्लैक फॉरेस्ट, पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट घाटी तंत्र।
  3. ज्वालामुखीय पर्वत (Volcanic Mountain):- ये पर्वत ज्वालामुखी के मुख के चारों ओर ज्वालामुखीय पदार्थों के निरंतर जमा होने और निक्षेप होने के कारण बनते हैं। उदाहरण : माउंट फ्यूजी, माउंट मेयन आदि।
  4. अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains):- यह अवक्षेपण प्रक्रिया के बाद पर्वतों का उद्भव है। उदाहरण : अमेरिका का मोनाडनॉक, अरावली आदि।

ज्वालामुखीयता (Volcanism):-

ज्वालामुखीतया में पृथ्वी सतह की ओर एवं पृथ्वी की सतह पर पिघली चट्टानों (मैग्मा) की गति और कई अंतर्वेधी और बहिर्वेधी ज्वालामुखी चट्टानों का निर्माण भी शामिल है।

  1. आग्नेय अंतर्वेधी चट्टानें

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a) सिल:- पिघले मैग्मा का क्षैतिज अंतर्वेधन

b) डाइक:- पिघले मैग्मा का लंबवत अंतर्वेधन

c) लैकोलिथ:- ये बड़ी गुंबद नुमा अंतर्वेधी आकृतियां हैं जिनका आधार स्तरीय और नीचे से पाइप जैसे आकृति से जुड़ा रहता है।

d) लैपोलिथ:- ऊपर की तरफ अवतल आकृति के साथ गेंद जैसी आकृति

e) फैकोलिथ:- सिंक्लाइन के आधार पर अथवा एंटीक्लाइन के शीर्ष पर पायी जानी वाली लहरदार चट्टान

f) बैथोलिथ:- चुंबकीय पदार्थों की एक बड़ी मात्रा भूपर्पटी की गहराई में ठंडी होती है और बड़े गुंबद का आकार ग्रहण कर लेती है।

2) लावा के प्रकार:

  1. सामान्य लावा:
  • सबसे गर्म लावा, अधिक द्रवित
  • गहरा रंग, Fe और Mg की प्रचूरता लेकिन Si की कमी
  • ये पतली चादर के रूप में बड़े भू-भाग पर शांतिपूर्वक बहते हैं और शील्ड ज्वालामुखी का निर्माण करते हैं।

    2. अम्लीय लावा

  • उच्च द्रवणांक के साथ अधिक गाढ़ा द्रव
  • हल्का रंग, कम घनत्व, Si की उच्च प्रतिशत
  • ये स्टीप कोन बनाते हैं, प्रकृति में बहुत विध्वंसक होते हैं

3) ज्वालामुखी के प्रकार:-

  1. सक्रिय:- इनमें ज्यादातर विस्फोट होता रहता है या हाल ही में कभी विस्फोट हुआ है।
  2. सुसुप्त:- इनमें पहले कभी विस्फोट हुआ है और इनसे भविष्य में विस्फोट होने की आशंका है।
  3. निष्क्रीय : वे ज्वालामुखी जिनसे सदियों तक कोई भी विस्फोट नहीं हुआ है और आगे भविष्य में ऐसा होने की आशंका भी कम ही है।

4) बहिर्वेधी भू-आकृतियां

  1. बेसाल्ट चट्टानें : लावा मैदानों और पठान का निर्माण होता है जहां लावा लंबी दूरी तक फैलता है।
  2. लावा गुंबद अथवा शील्ड ज्वालामुखी:- अत्यधिक द्रवित लावा से बनता है।
  3. लावा डैम्ड झील, लावा टंग, लावा पुल, लावा सुरंग
  4. लावा पदार्थ : पाइरोक्लास्ट, लैपिली, स्कोरिया, प्यूरिंस, ज्वालामुखी बम।
  5. कैल्डरा झील : तीव्र विस्फोट के कारण गड्ढा बन जाता है जो बाद में पानी से भर जाता है।

5) ज्वालामुखी का विश्व वितरण

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6) गर्म धारा और गेसर

गेसर गर्म पानी के फुव्वारे और अतितप्त धाराएं होती हैं जोकि पृथ्वी के अंदर से 150 मीटर तक की ऊंचाई पर जाकर फटते हैं।

इन्हें तीन प्रमुख क्षेत्रों में बांटा गया है:

1) आइसलैण्ड
2) उत्तरी द्वीप का रोटोरुआ जिला, न्यूज़ीलैण्ड
3) येलोस्टोन पार्क, व्योमिंग – ओल्ड फेथफुल गेसर

हॉट स्प्रिंग पृथ्वी के उन स्थानों पर पाए जाते हैं जहाँ जल पृथ्वी सतह की काफी गहराई में जाता है और आंतरिक बलों के कारण गर्म हो जाता है। ये बिना किसी विस्फोट के पृथ्वी की सतह पर आते हैं।

बहिर्जनिक प्रक्रियाएं (Exogenic Process) :-

अनाच्छादन (Denudation) पृथ्वी की ऊपरी सतह के हटने की प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप
ऊपरी सतह का अपरदन और समतलीकरण होता है। यह प्रक्रिया चार चरणों में होती है

  • अपक्षय
  • अवक्षेपण
  • परिवहन
  • निक्षेपण

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1) अपक्षय (Weathering): अपक्षय को विभिन्न मौसम और जलवायु कारकों की क्रियाओं द्वारा चट्टानों के यांत्रिक विखंडन और रासायनिक अपघटन के रूप में परिभाषित किया जाता है।

  1. रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering): यह वायु और जल के संपर्क में आने के कारण चट्टानों का अत्यधिक धीमा और क्रमिक अपघटन है।
    (i) घोल : खनिजों के जल अथवा अम्ल में विलेय होने पर चट्टान के पदार्थ अपने घटक तत्त्वों में अलग हो जाते हैं। CO2 जल में घुलकर दुर्बल कार्बोनिक अम्ल बनाती है जो कार्स्ट स्थलाकृति को प्रभावित करती है।
    (ii) कार्बोनीकरण : कार्बोनीकरण खनिजों के साथ कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट की अभिक्रिया है और यह फेल्सपार और कार्बोनेट खनिजों के विखंडन में मदद करने वाली एक सामान्य प्रक्रिया है।
    (iii) जलयोजन: जलयोजन जल के रासायनिक रूप से जुड़ने की प्रक्रिया है। कैल्शियम सल्फेट जल को अवशोषित करके जिप्सम में बदल जाता है जोकि कैल्शियम सल्फेट की तुलना में अधिक अस्थायी होता है।
    (iv) ऑक्सीकरण और अपचयन:
    ऑक्सीकरण ऑक्साइड और हाइड्रॉक्साइड के निर्माण के लिए ऑक्सीजन का खनिजों के साथ जुड़ना है। उदाहरण: लाल लोहा ऑक्सीकरण के कारण भूरे और पीले लोहे में बदल जाता है।
    अपचयन में, ऑक्सीकृत खनिजों को ऐसे वातावरण में रखा जाता है जहाँ ऑक्सीजन अनुपस्थित होती है। उदाहरण: लोहे के लाल रंग का अपचयन होने पर वह हरे और नीले ग्रे रंग में बदल जाता है।

  2. भौतिक अपक्षय (Physical Weathering):- ये कुछ प्राकृतिक बलों पर निर्भर करते हैं जैसे गुरुत्वाकर्षण बल, विस्तार बल और जल का दाब इत्यादि। अपक्षय प्रक्रिया का कारण तापीय विस्तार और दाब का मुक्त होना है
    (i) भारविहीनीकरण और विस्तारण: पृथ्वी की ऊपरी सतह का भार हटने के कारण उसके नीचे की परत का विस्तार होता है और चट्टानों का विखंडन होता है। शल्कस्खलन प्रक्रिया घटित होने से शल्कस्खलन गुंबद उभरकर आते हैं।
    (ii) तापक्रम में परिवर्तन एवं विस्तारण: दैनिक तापांतर (विशेषकर मरुस्थलीय क्षेत्रों में) कारण ऊपरी पर्त निचली पर्तों की तुलना में अधिक तेजी से फैलती हैं और आंतरिक पर्तें अधिक तेजी से सिकुड़ती हैं और आंतरिक तनाव और विखंडन की स्थिति पैदा होती है।
    (iii) हिमकरण, पिघलन और तुषार जमाव : चट्टानों की दरारों में पानी के जमा होने और फिर उसके जमने के कारण चट्टानों के बीच तनाव पैदा होता है जिसके फलस्वरूप चट्टानों का अपक्षय होता है।
    (iv) लवण अपक्षय: चट्टानों में कैल्शियम, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम आदि लवण तापीय क्रिया, जलयोजन और क्रिस्टलीकरण के कारण चट्टानों में फैलते हैं। इस प्रक्रिया के कारण रवेदार विखंडन होता है।

  3. जैविक अपक्षय (Biological Weathering): जीवों की वृद्धि और गतिशीलता के कारण वातावरण से खनिजों और आयनों का मिलना अथवा अलग होना जैविक अपक्षय है। उदाहरण: मृत पौधे एवं जंतु पदार्थों का अपक्षय होना, पशुओं का चरण, मानव क्रियाएं आदि।

ब्रह्त संचलन (Mass Movements)

इसमें गुरुत्वाकर्षण बल के सीधे प्रभाव के अधीन ढाल के अनुरूप चट्टानों के ब्रह्त मलवा का स्थानांतरण होता है। ब्रह्त संचलन में केवल गुरुत्वाकर्षण का योगदान होता है इसमें अन्य भू-आकृतिक तत्त्व जैसे गतिशील जल, ग्लेशियर, पवन, लहर और धाराएं ब्रह्त संचलन की प्रक्रिया में भाग नहीं लेते हैं।

 

a. मंद संचलन:

  1. मंद विरूपण: पदार्थों का संचलन बहुत धीमा और गैर-आभासी होता है।
  2. सोलिफ्लक्शन: जल से संतृप्त अथवा भीगी हुई ब्रह्त मृदा अथवा महीन रवेदार चट्टान का ढाल के अनुरूप बहना है।

b. तीव्र संचलन:

  1. भूस्खलन: भुस्खलन अपेक्षाकृत तीव्र और अवगम्य संचलन है। इसमें स्खलित होने वाले पदार्थ अपेक्षयता शुष्क होते हैं। इन्हें स्लंप, मलबे का फिसलना और चट्टान का फिसलना कहते हैं।
  2. मृदा प्रवाह: यह जलयोजित मिट्टी अथवा चिकनी मिट्टी पदार्थों का पहाड़ी के ढाल अथवा निम्न ढलान के अनुदिश प्रवाह है।
  3. कीचड़ प्रवाह : वनस्पति आच्छादन की अनुपस्थिति में और अधिक वर्षा के साथ, अपक्षय सामग्रियों की मोटी परत, जल के साथ संतृप्त हो जाती है और वे निश्चित नलिकाओं में से धीमी अथवा तीव्र गति से फिसलती है। किसी घाटी में यह कीचड़ की धारा जैसा दिखाई देता है।

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