Study Notes on Ozone layer depletion: Causes, Effects & Solutions

By Rohit Singh|Updated : March 31st, 2022

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    

 

ओजोन परत

ओजोन परत समताप मंडल में मौजूद है। ओजोन परत सूर्य की पराबैंगनी (यूवी) किरणों को अवशोषित करने में मदद करती है, जो मानव के लिए हानिकारक हैं। यूवी किरणें सनबर्न का कारण बन सकती हैं और डीएनए को नुकसान पहुंचा सकती हैं, ओजोन परत सबसे अधिक हानिकारक विकिरणों को अवशोषित करती है और हमारी रक्षा करती है। यह परत कम से कम 98% हानिकारक अल्ट्रा-वायलेट विकिरणों को रोकती है, जो सूर्य से पृथ्वी पर आती है और इन विकिरणों से पौधों के साथ-साथ मनुष्यों, पशुओं की रक्षा करती है।

ओजोन छिद्र क्या है?

वायुमंडल में ओजोन के अणु उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं और फिर पृथ्वी के वायुमंडल को ढंकते हुए फैल जाते हैं। लेकिन प्रचलित समतापमण्डलीय पवनों के कारण ये ध्रुवों की ओर स्थानांतरित हो जाता है। जब किसी विशेष स्थान पर ओजोन की सांद्रता कम हो जाती है, तो इसे ओजोन छिद्र माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ओजोन परत के क्षतिग्रस्त क्षेत्र को ओजोन छिद्र के रूप में जाना जाता है। इसकी एकाग्रता को डॉब्सन यूनिट में मापा जाता है। सबसे बड़ा ओजोन छिद्र अंटार्कटिका के ऊपर है।

ओजोन परत की उपस्थिति को समझने के लिए, आइए हम वायुमंडलीय परतों पर एक नज़र डालें:

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  • ओजोन परत की मोटाई भौगोलिक रूप से भिन्न-भिन्न होती है, यह भूमध्य रेखा पर पतली और ध्रुवों के पास मोटी होती है। जहाँ कहीं भी, परत पतली होती है, हानिकारक विकिरण वाली पराबैगनी (UV) किरणें इसके बीच से गुजरती हैं और पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं। अवशोषित तरंग दैर्ध्य के आधार पर, यूवी विकिरण तीन प्रकार के होते हैं:

    1. UV-C (280-100 नैनोमीटर): पूरी तरह से डाइऑक्सीजन और ओजोन के संयोजन द्वारा रोक दी जाती है।
    2. UV- B (315-280 नैनोमीटर): प्रमुख रूप से ओजोन द्वारा रोक दी जाती है। लेकिन इसका एक भाग गुजर जाता है, जो विटामिन-D के निर्माण में मदद करता है।
    3. UV-A (400-315 नैनोमीटर): सभी के लिए पारदर्शी है। यह पूरी तरह से पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है।

    यूवी विकिरण न केवल मनुष्यों के लिए बल्कि पौधों और पशुओं के लिए भी हानिकारक है।

    ओजोन (O3) का निर्माण कैसे होता है?

    ओजोन स्वाभाविक रूप से समतापमंडल (स्ट्रैटोस्फियर) में उत्पन्न होती है, जब अत्यधिक ऊर्जावान सौर विकिरण ऑक्सीजन, O2 के अणुओं से क्रिया करता है, तब वह दो ऑक्सीजन परमाणुओं को प्रकाशिक अपघटन (फोटोलिसिस) नामक एक प्रक्रिया में अलग कर देता है। ओजोन (O3) ऑक्सीजन के तीन अणुओं से बना है। ओजोन द्वारा बनाई गई परत को ओजोन परत के रूप में जाना जाता है। यदि एक मुक्त ऑक्सीजन परमाणु दूसरे O2 से टकराता है, तो वह उससे जुड़ जाता है, जिससे ओजोन O3 बनता है। ओजोन परत की सांद्रता लगभग 10 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) है और पृथ्वी के वायुमंडल में, यह लगभग 0.3 पीपीएम में मौजूद है।

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ओजोन परत का क्षरण कैसे होता है?

विभिन्न मानवीय गतिविधियों के कारण समतापमंडल में ओजोन परत से बाहर निकलने, धीरे-धीरे कम होने या क्षीण होने को ओजोन निम्नीकरण कहा जाता है। ओजोन परत का क्षरण मुख्य रूप से ग्रीन हाउस गैसों (GHG) जैसे CO2 और मीथेन, अन्य ग्रीन हाउस गैसों के कारण होता है जिसमें CFCs (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) शामिल होते हैं जो एयरोसोल्स में उपयोग किए जाते हैं जैसे घरेलू स्प्रे, हेयर स्प्रे, कैन, फ्रिज और प्लास्टिक बनाने आदि में। CFC और हैलोन की रासायनिक अभिक्रिया के कारण ओजोन अणु टूट जाते हैं और इस प्रकार, ओजोन परत की यूवी किरणों की रोकने की क्षमता कम हो जाती है। अन्य गैसें जो ओजोन परत के क्षय में योगदान करती हैं, वे हैं नाइट्रिक ऑक्साइड (NO), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), हाइड्रॉक्सिल (OH), क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और ब्रोमोफ्लोरोकार्बन आदि से ब्रोमीन (Br) परमाणु।

  • विशेष रूप से अंटार्कटिका के ऊपर, ध्रुवीय क्षेत्रों में ओजोन निम्नीकरण ज्यादा प्रभावी है।
  • किसी विशेष क्षेत्र में ओजोन परत की गंभीर कमी को ओजोन होल कहा जाता है।

आम तौर पर हम अंटार्कटिका के ऊपर यानि दक्षिणी ध्रुव पर ओजोन परत का घनत्व को कम होता पाते हैं। यह रासायनिक अभिक्रियाओं के कारण होता है, जो मुख्य रूप से ध्रुवीय समतापमंडलीय मेघों, बर्फ के कणों या तरल बूंदों की सतह पर होती हैं जो अत्यधिक ठंड में उच्च ऊंचाई पर निर्मित होते हैं। लेकिन 2019 में, उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में असामान्य रूप से स्थिर ध्रुवीय भंवर (पोलर वोर्टेक्स) के चलते कम तापमान के कारण ब्रोमीन और क्लोरीन परमाणुओं (आमतौर पर सीएफसी और अन्य गैसों) की रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप ओजोन निम्नीकरण के कारण उत्तरी ध्रुव में आर्कटिक के ऊपर ओजोन छिद्र बनने की शुरुआत हो गयी।

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ओजोन निम्नीकरण के प्रमुख कारण:

  • मुख्य कारण स्प्रे कैन और रेफ्रिजरेंट (शीतलकों) में पाए जाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) और हैलोन गैसों की वायुमंडल में विमुक्ति है।
  • नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग।
  • सुपरसोनिक विमानों का उपयोग।
  • परमाणु विस्फोट

 ओजोन निम्नीकरण के प्रभाव:

  • यह मानव स्वास्थ्य पर पराबैंगनी किरणों के प्रभाव को बढ़ाएगा।
  • इससे सनबर्न, स्किन कैंसर या मोतियाबिंद हो सकता है।
  • अत्यधिक पराबैंगनी किरणें हमारी आंखों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
  • इससे ग्लोबल वार्मिंग हो सकती है।
  • यह पौधों को नष्ट कर सकता है।

ओजोन निम्नीकरण से परत बचाव के उपाय:

  • ओजोन निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी पदार्थों (ओडीएस) के उपयोग को कम करना।
  • ओजोन परत की सुरक्षा के लिए 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का प्रभावी कार्यान्वयन।
  • प्रशीतन और एयर कंडीशनिंग उद्योग में पर्यावरण के अनुकूल रसायनों का उपयोग।
  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) का उत्पादन करने वाले उद्योगों को नियंत्रित करना।
  • ऑटोमोबाइल उद्योग में पर्यावरण के अनुकूल ईंधन का उपयोग।

 

ओजोन परत निम्नीकरण से बचाव के प्रयास

1980 के दशक की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने पाया कि अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत पतली हो रही थी। 1987 में, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के माध्यम से दुनिया भर के देश इस समस्या को ठीक करने के लिए एक साथ आए। एक अंतर्राष्ट्रीय संधि ने ओजोन-क्षयकारी रसायनों यानी क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया। ये रसायन दशकों से उपयोग में थे और वे लंबे समय तक वातावरण में मौजूद रहते हैं। इसलिए इनके प्रभावों का अवलोकन करने में कई साल लग गए। 2000 में देखा गया ओजोन छिद्र वैज्ञानिकों द्वारा अब तक का सबसे बड़ा छिद्र था। लेकिन हालात धीरे-धीरे सुधरने लगे। अध्ययनों से पता चलता है कि ओजोन छिद्र 21वीं सदी के मध्य तक ठीक हो जाना चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम:

a. वियना सम्मेलन:

  • यह 1985 में वियना, ऑस्ट्रिया में हुआ।
  • ओजोन छिद्र की खोज सबसे पहले इसी दौरान हुई थी।
  • इसे ओजोन परत के संरक्षण के लिए हस्ताक्षरित किया गया था।
  • इसमें कानूनी रूप से बाध्यकारी कटौती लक्ष्य शामिल नहीं हैं।

b. सेविंग ओज़ोन लेयर कांफ्रेस:

  • यह कांफ्रेंस लंदन, 1985 में आयोजित की गयी थी।
  • यह सभी ओजोन-क्षयकारी पदार्थों पर प्रतिबन्ध की मांग करता है।

c. हेलसिंकी सम्मेलन:

  • यह मई 1989 में आयोजित हुआ।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को संशोधित करने के लिए हेलसिंकी सम्मेलन आयोजित किया गया था।
  • सीएफसी के इस्तेमाल को समाप्त करने के लिए एक समझौता हुआ था

d. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल:

जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि ओजोन परत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ठीक हो रही है, जिसे 1987 में 197 देशों द्वारा ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उपयोग को कम करने के लिए हस्ताक्षरित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र में सार्वभौमिक अनुसमर्थन प्राप्त करने वाली पहली संधि थी। इस संधि ने ओजोन परत के क्षरण को रोकने में मदद की है।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की मुख्य बातें:

  • यह 1987 में लागू हुआ।
  • यह ओजोन परत पर वियना कन्वेंशन का एक प्रोटोकॉल है।
  • यह 197 देशों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था ताकि ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उपयोग को कम किया जा सके।
  • यह केवल ओजोन-क्षयकारी पदार्थों पर लक्षित है (ग्रीन हाउस गैस यानी हाइड्रो फ्लोरोकार्बन नहीं)
  • सभी विकसित देशों ने CFC के उपयोग को कम करने का निर्णय लिया। इसे एक सार्वभौमिक संधि के रूप में माना जाता है (सभी संयुक्त राष्ट्र देशों द्वारा वर्गीकृत)
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में पहली संधि माना जाता है जिसने सार्वभौमिक अनुसमर्थन प्राप्त किया।
  • इसने ओजोन परत के क्षरण को रोकने में मदद की है।
  • यह कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है

किगाली समझौता:

किगाली समझौता 2045 तक चरणबद्ध तरीके से शक्तिशाली ग्रीन हाउस गैसों, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन्स (एचएफसी) के उत्पादन और उपयोग को खत्म करने के लिए बनाई गई रणनीति है। एचएफसी अब एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, एयरोसोल, फोम और अन्य उत्पादों में व्यापक रूप से मौजूद हैं। लेकिन इनमें उच्च ग्लोबल वार्मिंग क्षमता है। इसलिए एचएफसी उत्सर्जन में अनियंत्रित वृद्धि, इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे रखने के प्रयासों को चुनौती देती है। जलवायु प्रणाली की सुरक्षा के लिए एचएफसी पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।

  • यह 2016 में ओजोन परत के क्षय को कम करने के लिए हस्ताक्षरित किया गया था
  • यह 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन करता है।
  • इसका उद्देश्य 2045 के अंत तक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) को लगभग 80-85 प्रतिशत तक कम करना है।
  • हस्ताक्षरकर्ता पक्षकारों के बीच गैर-अनुपालन उपायों के साथ यह कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के लिए किगाली संशोधन कानूनी रूप से बाध्यकारी है और 1 जनवरी, 2019 से लागू हुआ।
  • भारत ने इस समझौते की पुष्टि की है।

हाल के अध्ययन से पता चलता है कि ओजोन परत ठीक हो रही है क्योंकि दुनिया में कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण लॉकडाउन चल रहा है और साथ ही परत के क्षय को रोकने के प्रयास भी जारी हैं। शोधकर्ताओं और विद्वानों का मत है कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओज़ोन परत ठीक हो रही है। नवीनतम अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि देशों को कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्सर्जन को कम करने के लिए सबसे उपयुक्त और अधिक मजबूत कदम उठाने चाहिए। इस बात से कोई इंकार नहीं करता है कि वर्तमान में चल रहे कोरोना वायरस के प्रकोप पर अंकुश लगाने के लिए कई देशों में तालाबंदी का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

 

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