Day 8: Study Notes on भारतेन्दु युग

By Sakshi Ojha|Updated : July 27th, 2021

यूजीसी नेट परीक्षा के पेपर -2 हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण विषयों में से एक है हिंदी साहित्य का आधुनिक काल। इस विषय की प्रभावी तैयारी के लिए, यहां यूजीसी नेट पेपर- 2 के लिए  हिंदी साहित्य का आधुनिक काल के आवश्यक नोट्स कई भागों में उपलब्ध कराए जाएंगे। भारतेन्दु युग से सम्बंधित नोट्स इस लेख मे साझा किये जा रहे हैं। जो छात्र UGC NET 2021 की परीक्षा देने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए ये नोट्स प्रभावकारी साबित होंगे।            

  • भारतेन्दु युग का उदय हिन्दी कविता के लिए नवीन जागरण के संदेशवाहक के रूप में हुआ। इसे पुनर्जागरण काल भी कहा जाता है। आचार्य शुक्ल ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के रचनाकाल को दृष्टि में रखकर संवत् 1925 मे 1950 की अवधि को नई धारा या प्रथम उत्थान की संज्ञा दी।
  • उल्लेखनीय है कि भारतेन्दु द्वारा संपादित मासिक पत्रिका 'कविवचनसुधा’ का प्रकाशन 1868 (1925 में आरम्भ हुआ। अतः भारतेन्दु युग का उदय 1868 ई. वि) से मानना उचित है। भारतेन्दु जी का रचनाकाल 1868 से 1885 ई. तक रहा है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' का प्रकाशन 1903 संभाला था। सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन 1900 ई. से शुरू हुआ। अतः 1868 से 1900 ई. तक की अवधि को भारतेन्दु युग कहना समीचीन है।
  • यह युग वस्तुतः हर क्षेत्र में पुनर्जागरण का युग है। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक, साहित्यिक शिक्षा आदि क्षेत्रों में कुछ नयापन दिखाई दे रहा था। पुनर्जागरण से नवीन प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिला। भारतेन्दु जी का युग आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार है। इसे संक्रांति का युग भी कह सकते हैं। यह युग प्राचीन परम्पराओं और मर्यादाओं की रक्षा करते हुए भी नवीन राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना को लेकर आगे बढ़ा।
  • इस युग में मध्यवर्गीय सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण हुआ। साहित्य की विभिन्न विधाओं; जैसे- निबंध, नाटक तथा आलोचना का सूत्रपात भी इस युग में आरंभ हुआ। अतः साहित्यिक दृष्टि से यह युग विशेष उल्लेखनीय में रहा।

विद्वानों के अनुसार भारतेन्दु युग की व्याप्ति का समय

  1. मिश्रबन्धु 1926-1945 वि तक
  2. डॉ. रामकुमार वर्मा 1927-1957 वि तक
  3. डॉ. केसरी नारायण शुक्ल 1922-1957 वि तक
  4. डॉ. रामविलास शर्मा 1925-1957 वि तक

भारतेन्दु युग की प्रवृत्तियाँ : 

  • राष्ट्रीयता की भावना 
  • समाज दुर्दशा का चित्रण एवं सामाजिक चेतना 
  • प्रकृति चित्रण 
  • श्रृंगारिकता 
  • हास्य एवं व्यंग्य 

भारतेन्दु  मंडल के कवि: 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

  • भारतेन्दु जी (1850-1885 ई.) को सही अर्थों में गद्य का जनक कहा जा सकता है। उन्होंने गद्य की भाषा का संस्कार तो किया ही भाषा को भी सुसंस्कृत किया। इनके समय में गद्य की बड़ी उन्नति हुई।
  • आचार्य शुक्ल जी भारतेन्दु के उल्लेखनीय योगदान पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि "हमारे जीवन व साहित्य के बीच जो विच्छेद बढ़ रहा था, उसे उन्होंने दूर किया। हमारे साहित्य को नए नए विषयों की ओर प्रवृत्त करने वाले हरिश्चन्द्र ही हुए। अल्पायु में इन्होंने विपुल एवं समृद्ध साहित्य की रचना की।" 
  • भारतेन्दु जी ने प्रकृति, श्रृंगार, कृष्ण लीला आदि का वर्णन अपनी स्वतंत्र अनुभूति से किया। काव्य में सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों का समावेश पहली बार इसी युग हुआ था। पत्र-पत्रिकाओं, निबन्धों, कविताओं को में माध्यम बनाकर भारतेन्दु जी ने तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों, साम्प्रदायिकता, रूढ़ियों आदि पर करारा प्रहार किया।
  • इनकी काव्य कृतियों की संख्या 70 है, जिनमें प्रेम मल्लिका, प्रेम सरोवर, वर्षा विनोद, विनय प्रेम पचासा, प्रेम फुलवारी आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। 
  • भारतेन्दु जी के प्रभाव से उनके युग में साहित्यकारों का एक ऐसा मंडल तैयार हो गया था, जिसने 'राज्य' विषय-वस्तु भाषा व शैली की दृष्टि से भारतेंदु का अनुसरण किया। इसी मंडल को भारतेन्दु मण्डल कहते हैं।

बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'

  • भारतेन्दु मण्डल के कवियों में प्रेमघन (1855-1923 ई.) का प्रमुख स्थान है, उनका जन्म उत्तर प्रदेश के जिला मिर्जापुर के एक संपन्न ब्राह्मण कुल में हुआ था। 
  • भारतेन्दु की भाँति उन्होंने भी पद्म और गद्य दोनों में विद्युत साहित्य रचना की है। साप्ताहिक 'नागरी नीरद' और मासिक ‘आनन्द कादम्बिनी' का सम्पादन द्वारा उन्होंने तत्कालीन पत्रकारिता को भी नई दिशा दी है। 'अब्र' नाम से उन्होंने उर्दू में कुछ कविताएँ लिखी हैं।
  • 'जीर्ण जनपद', 'आनन्द अरुणोदय', 'हार्दिक हर्षादर्श', 'मयंक-महिमा, 'अलौकिक लीला', 'वर्षा-बिन्दु' आदि उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं, जो अन्य रचनाओं के साथ 'प्रेमघन-सर्वस्व' के प्रथम भाग में संकलित हैं। इन्होंने भारतेन्दु के आदर्शों का पूर्ण अनुसरण करते हुए उन सभी प्रवृत्तियों को अपनाया, जो भारतेन्दु जी के काव्य में मिलती हैं।
  • आचार्य शुक्ल जी इनके सम्बन्ध में लिखते हैं "देश की दशा को सुधारने के लिए जो राजनीतिक या धर्म सम्बन्धी आन्दोलन चलते रहे, उन्हें ये बड़ी उत्कण्ठा से परखा करते थे, जब कहीं कुछ सफलता दिखाई देती, तब वह अपने लेखों व कविताओं से खुशी प्रकट करते।"

प्रतापनारायण मिश्र

  • 'ब्राह्मण के संपादक प्रतापनारायण मिश्र (1856-1894 ई.) का जन्म वैजेगांव, जिला उन्नाव में हुआ था। पिता के कानपुर चले जाने के कारण। उनकी शिक्षा-दीक्षा कहां हुई। ज्योतिष का पैतृक व्यवसाय न अपनाकर वे साहित्य रचना की ओर प्रवृत्त हुए। कविता, निबंध और नाटक उनके मुख्य रचना क्षेत्र थे। प्रतापनारायण मिश्र मूलतः विनोदी प्रकृति के थे। कविता के क्षेत्र में उन्होंने प्रणय व्यंजना, समाज सुधार, देशभक्ति, हास्य विनोद आदि प्रवृत्तियों का परिचय दिया है।
  • 'प्रेमपुष्पावली', 'मन की लहर', 'लोकोक्ति शतक', 'तृप्यन्ताम्' और 'शृंगार-विलास' उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। 'प्रताप लहरी' उनकी प्रतिनिधि कविताओं का संकलन है, किन्तु भक्ति और प्रेम की तुलना में समसामयिक देश-दशा और राजनीति चेतना का वर्णन उन्होंने मनोयोग से किया है। 

ठाकुर जगमोहन सिंह

  • ठाकुर जगमोहन सिंह मध्य प्रदेश की विजय राघवगढ़ रियासत के राजकुमार थे, उन्होंने काशी में संस्कृत और अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की। वहां रहते हुए उनका भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से सम्पर्क हुआ, किन्तु भारतेन्दु की रचना शैली को उन पर वैसी छाप नहीं मिलती जैसी प्रेमघन और प्रतापनारायण मिश्र के कृतित्व में लक्षित होती है
  • 'प्रेमसम्पत्तिलता' (1885), 'श्यामालता' (1885), 'श्यामा-सरोजनी' (1886) और 'देवयानी' (1886), 'श्यामास्वप्न' शीर्षक उपन्यास में भी उन्होंने प्रसंगवश कुछ कविताओं का समावेश किया है। 'ऋतुसंहार' और 'मेघदूत' भी ब्रजभाषा की सरल कृतियाँ हैं।

बालमुकुन्द गुप्त

  • रचनाकाल की दृष्टि से भारतेन्दु मण्डल के अन्तिम कवियों में से हैं। काव्य में ये भारतेन्दु को छोड़कर अन्य सबसे अधिक सशक्त एवं प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। किसानों की दुर्दशा एवं धनिकों की निष्ठुरता का निरूपण इनकी कुछ कविताओं में मार्मिक रूप से मिलता है।

अम्बिकादत्त व्यास

  • कविवर दुर्गादत्त व्यास के पुत्र अम्बिकादत्त व्यास (1858-1900 ई.) काशी के निवासी सुकवि थे। वे संस्कृत और हिन्दी के अच्छे विद्वान थे और दोनों भाषाओं में साहित्य-रचना करते थे। 
  • 'पीयूष-प्रवाह' के संपादक के रूप में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है, उनकी कृतियों में 'पावस पचासा' (1886), 'सुकवि-सतसई' (1887) और 'हो हो होरी' उल्लेखनीय हैं। इनकी रचना ललित ब्रजभाषा में हुई है।
  • 'बिहारी-बिहार' उनकी एक अन्य प्रसिद्ध रचना है, जिसमें महाकवि बिहारी के दोहों का कुण्डलिया छन्द में भाव विस्तार किया गया है।

राधाकृष्ण दास

  • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई राधाकृष्ण दास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। कविता के अतिरिक्त उन्होंने नाटक, उपन्यास और आलोचना के क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय साहित्य रचना की। 'भारत-बारहमासा' और 'देश-दशा' समसामयिक भारत के विषय में उनकी प्रसिद्ध कविताएँ हैं। राधाकृष्ण दास की कुछ कविताएँ 'राधाकृष्ण-ग्रन्थावली' में संकलित हैं।
  • अन्य कवि भारतेन्दु युग के अन्य रचनाकारों की रचनाओं में भक्तिभावना तथा शृंगार वर्णन की प्रमुखता रही है। इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम नवनीत चतुर्वेदी का नाम आता है। इनकी प्रसिद्ध कृति 'कुब्जा पचीसी' रीति पद्धति की सरस रचना है। गोविन्द गिल्लाभाई कृत 'शृंगार सरोजनी', 'पावस पयोनिधि’, “राधामुख-षोडसी' और 'षड्ऋतु' भक्ति और प्रेमवर्णन सम्बन्धी रचनाएँ है। दिवाकर भट्ट कृत 'नखशिख', 'नवोटारत्न', रामकृष्ण वर्मा कृत 'बलवीर पचासा', गुलाब सिंह कृत 'प्रेम सतसई', दुर्गादत्त व्यास कृत 'अधमोद्धार शतक' आदि उल्लेखनीय हैं।

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हमें आशा है कि आप सभी UGC NET परीक्षा 2021 के लिए पेपर -2 हिंदी, आधुनिक काल (भारतेन्दु युग) से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु समझ गए होंगे। 

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Sakshi OjhaSakshi OjhaMember since Mar 2021
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