Study Notes हिंदी नवजागरण

By Mohit Choudhary|Updated : June 24th, 2022

यूजीसी नेट परीक्षा के पेपर -2 हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण विषयों में से एक है हिंदी नवजागरण। इस विषय की की प्रभावी तैयारी के लिए, यहां यूजीसी नेट पेपर- 2 के लिए हिंदी नवजागरण के आवश्यक नोट्स कई भागों में उपलब्ध कराए जाएंगे। इसमें से UGC NET के कथेतर गद्य से सम्बंधित नोट्स  इस लेख मे साझा किये जा रहे हैं। जो छात्र UGC NET 2022 की परीक्षा देने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए ये नोट्स प्रभावकारी साबित होंगे।      

हिन्दी नवजागरण

  • हिन्दी नवजागरण से अभिप्राय भारत के हिन्दी प्रदेशों में आए सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक जागरण से है। हिन्दी नवजागरण का प्रारम्भ 1857 के विद्रोह (प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम) के पश्चात माना जाता है। इसे तीन चरणों में बाँटा गया। 
  1. प्रथम चरण 1857 का महाविद्रोह था।
  2. दूसरा चरण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जन्म से लेकर भारतेन्दु युग को माना गया। 
  3. तीसरा चरण महावीर प्रसाद द्विवेदी की 'सरस्वती' पत्रिका से माना गया। 
  • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के आगमन को हिन्दी में नवजागरण काल के रूप में देखा गया। इस युग को नवजागरण नाम देने वाले 'डॉ. रामविलास शर्मा' हैं।
  • नवजागरण का पहला अनुभव बंगाल ने किया। राजा राममोहन राय ने सामाजिक सुधार के कार्यों का प्रारम्भ बंगाल से किया। तत्पश्चात सारा देश आधुनिकता से अवगत हुआ। राजा राममोहन राय ने भारत में आधुनिकता की नींव रखी। 
  • हिन्दी नवजागरण का सूत्रपात भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया हिन्दी नवजागरण की शुरुआत भारतेन्दु के इस कथन से मानी जाती है कि “सन् 1873 में हिन्दी नई चाल में ढली।” 

हिन्दी के विकास के चरण

  • भारत में सन् 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विद्रोह अंग्रेजी शासन को पूर्णता से उखाड़ फेंकने के लिए किया गया। भारतीय अंग्रेजी राज के नकारात्मक पक्ष को स्वीकार नहीं करना चाहते थे चाहे वह सभ्यता से सम्बन्धित हो या भाषा से। 
  • हिन्दी का विकास क्रम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र युगीन साहित्य से होता हुआ वर्तमान समय में भी गतिमान है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के निबन्ध, नाटकों, काव्य व अन्य विधाओं को हिन्दी के विकास का चरण माना जाता है। उनकी रचनाएँ भाषा के क्षेत्र में तो प्रशंसनीय कार्य कर ही रही थीं. साथ ही वह देश को नवजागरण से भी अवगत करा रही थी। हिन्दी नवजागरण के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पश्चात् हिन्दी नवजागरण के क्षेत्र में महावीर प्रसाद द्विवेदी का स्थान अग्रणी है। द्विवेदी जी ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के हिन्दी नवजागरण सम्बन्धी विचारों व चेतना को और अधिक मजबूती से साहित्यिक क्षेत्र में रखा। 
  • द्विवेदी जी ने वर्ष 1903 में 'सरस्वती' पत्रिका का कार्यभार संभाला, उन्होंने पत्रिका के माध्यम से हिन्दी नवजागरण को दिशा देने का कार्य किया व भाषा संस्कारों को कुशलता प्रदान की।
  • उनसे बहुत से प्रख्यात लेखक भी प्रेरित थे, जिन्होंने हिन्दी के विकास क्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें हजारी प्रसाद द्विवेदी, भगवतशरण उपाध्याय, रामविलास शर्मा आदि हैं। इन सभी के प्रयासों से हिन्दी नवजागरण अपने आयाम तक पहुँच सका।

हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ

  • हिन्दी नवजागरण का एक अहम बिन्दु उसकी संकुचित साम्प्रदायिकता है क्योंकि इसके केंद्र में हिन्दी और हिन्दू हैं। 
  • डॉ नामवर सिंह के अनुसार "हिन्दी प्रदेश के नवजागरण के सम्मुख यह बहुत गंभीर प्रश्न है कि यहां का  नवजागरण हिन्दू-मुस्लिम दो धाराओं में विभक्त हो गया। यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है कि बंगाल का नवजागरण इस प्रकार विभक्त नहीं हुआ। आश्चर्य की बात यह है कि हिन्दी-प्रदेश का नवजागरण धर्म, इतिहास, भाषा सभी स्तरों पर दो टुकड़ों में बंट गया।
  • डॉ. नामवर जी के उदर से स्पष्ट है कि तत्कालीन उत्तर भारतीय समाज दो धार्मिक संगठनों में विभाजित होने लगा था, जिसके लिए उत्तरी भारत की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों उत्तरदायी थी। परिणामतः हिन्दी प्रदेश में भाषायी इन्, हिन्दी-उर्दू विवाद नागरी सुधार आन्दोलन का जन्म हुआ।
  • भारतेन्दु युगीन साहित्य में भी कुछ समस्याएं उत्पन्न हुई, इसमें उर्दू परम्परा में लिखे गए साहित्य की चर्चा नहीं हुई है। भारतेन्दु युगीन हिन्दी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिन्दी का एक सही रूप तय क्र दिया गया,  बाकी रूपों को अवैध घोषित कर दिया और अध्ययन पर बल नहीं दिया। वास्तव में हिन्दी को नई चाल में ढलने से पूर्व उर्दू में साहित्य लिखना प्रारम्भ हो चुका था, इसलिए हिन्दी नवजागरण की चर्चा के समय उर्दू में लिखे साहित्य की चर्चा का होना आवश्यक है।
  • भारतेन्दु की विरासत को आगे बढ़ाते हुए द्विवेदी जी द्वंद्व की स्थिति में थे। वह और सभी विद्वान यह परिकल्पना कर रहे थे कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्रवाद कैसे स्थापित होगा। भारत पश्चिमी राष्ट्रों की तुलना में अलग था। यहाँ पश्चिमी राष्ट्रों के समान एक भाषा नहीं बोली जाती थी, लेकिन हिन्दी का प्रयोग सबसे अधिक लोगों द्वारा किया जाता था।
  • हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए ऐसी हिन्दी की परिकल्पना हुई, जिससे क्षेत्रीय बोलियों व हिन्दी के विविध रूपों के लिए स्थान नहीं बचा। एक ही कार्य के लिए हिन्दी के भिन्न-भिन्न उपकरणों का इस्तेमाल हुआ।

हिन्दी नवजागरण के प्रेरक तत्व

  • हिन्दी नवजागरण को राष्ट्रीय भावना के साथ जोड़ा जाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र व द्विवेदी जी की रचनाओं पर भी तत्कालीन परिस्थितियों के प्रभाव पड़े हैं। नवजागरण के तीसरे दौर के रूप में डॉ. रामविलास शर्मा ने द्विवेदी जी व उनके सहयोगियों के विचारों का वर्णन किया है। 'सरस्वती' पत्रिका में भारत के अतिरिक्त यूरोप व एशिया के नवजागरण की चर्चा की गई।
  • द्विवेदी जी का मानना था। कि समाचार पत्र, पुस्तक, पत्रिकाओं से पूरा राष्ट्र प्रेरणा ले सकता है, इसलिए उन्होंने हिन्दी नवजागरण हेतु 'सरस्वती' पत्रिका को साधन बनाया था और भी बहुत से प्रेरक तत्वों ने नवजागरण हेतु महत्त्वपूर्ण कार्य किए, जिनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:
  1. अंग्रेजों का भारत आगमन 
  2. पाश्चात्य विद्वानों का अनुवाद कार्य
  3. सुधारवादी आन्दोलन

हमें आशा है कि आप सभी UGC NET परीक्षा 2022 के लिए पेपर -2 हिंदी, 'हिंदी नवजागरण' से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु समझ गए होंगे। 

Thank you

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