Sabarimala Temple Issue

By Hemant Kumar|Updated : December 31st, 2019

सबरीमाला हिंदुओं का एक एतिहासिक पूजा स्थल है जो कई मिथकों, भक्तों और हालिया विवाद से घिरा हुआ है। केरल के पथानामथिट्टा जिले में स्थित सबरीमाला मंदिर के प्रमुख देवता भगवान अयपन्न हैं। इस मंदिर में, भगवान अयपन्न की पूजा “नैशतिक ब्रह्मचारी” के रूप में की जाती है जिसके कारण भक्तों के लिए भी कुछ कड़े रिवाजों की शुरुआत भी हुई। मंदिर के प्रशासन की जिम्मेदारी राज्य सरकार के अधीन एक स्वायत्त प्राधिकरण, त्रावनकोण देवास्वाम बोर्ड (TDB) की है।

विवाद क्या है?

सबरीमाला मंदिर विवाद एक तरफ परंपराओं और भक्तों के विश्वास और दूसरी तरफ महिलाओं के पूजा के अधिकार और संवैधानिक योग्यता के बीच संघर्ष की कहानी है।

परंपरा सवालों में क्यों है?

एक ब्रह्मचारी देवता का दैवीय पूजास्थल होने के कारण, मंदिर बोर्ड ने मासिक धर्म से गुजरने वाली महिलाओं (आयु 10 से 50 वर्ष) के लिए सबरीमाला में तीर्थयात्रा करने और भगवान अयपन्न की पूजा करने पर प्रतिबंध लगाया है। भक्तों द्वारा मानी जाने वाली इस परंपरा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह स्वयं भगवान के विश्वास के खिलाफ होगा।

एक और दृष्टिकोण यह भी है कि मासिक धर्म का रक्त अशुद्ध होता है, और इसलिए यह मंदिर परिसर को अशुद्ध कर सकता है। इस दृष्टि से, महिलाओं को अशुद्ध नहीं माना जाता है, बल्कि केवल उनके रक्त को अशुद्ध माना जाता है।

इस परंपरा के लिए वैधानिकता दलीलें क्या है?

  • कानूनी तौर पर, केरल हिंदु सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश की अनुमति) नियम, 1965 महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देता है।
  • फिर, केरल उच्च न्यायालय ने सन् 1991 में प्रतिबंध के पक्ष में निर्णय दिया कि यहाँ ऐतिहासिक समय से प्रतिबंध चलता आ रहा है और यह पूजा और समानता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है।
  • हालांकि, इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने सन् 2006 में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।

अन्य कहानी और इतिहास

यह धार्मिक स्थल जंगल के काफी अंदर स्थित है, और ऐसा कहा जाता है कि यहाँ जंगल के आसपास के निचली जाति के लोग एवं आदिवासी और तमिलनाडु से कुछ श्रृद्धालु आया करते थे। ऐसा माना जाता है कि यहाँ किसी वैदिक कर्मकाण्ड या किसी पवित्र रीति-रिवाज का पालन नहीं होता था। यह धार्मिक स्थल पाण्डलम राज परिवार के स्वामित्व में था। बाद में, उन्होंने त्रावणकोण राज परिवार को मंदिर और जंगल के अधिकार सौंप दिए। इस तरह, यह मंदिर त्रावणकोण रॉयल देवास्वॉम कमीशन (TRDC) के प्रबंधन के अतंर्गत आ गया।

जून 1950 में, शिकारियों ने सबरीमाला मंदिर में आग लगा दी और मंदिर को अपवित्र कर दिया। फिर त्रावणकोण देवस्वाम बोर्ड द्वारा नए मंदिर का निर्माण किया गया। ऐसा कहा जाता है कि तब से श्रृद्धालुओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है जो अब 50 लाख तक पहुँच गयी है।

ऊपरी जाति का प्रभुत्व

सन् 1970 के बाद से, मंदिर में ऊपरी जाति के श्रृंद्धालुओं की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती चली गयी। अंततः, यह तर्क दिया जाता है कि इससे ऊपरी जाति के रीति-रिवाजों और पवित्रता और अपवित्रता के नियमों की शुरुआत हुई। अतः आदिवासी और निचली जाति के लोगों में विभेदन होना शुरु हो गया। ऐसा भी कहा जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं थी। क्योंकि मासिक धर्म को उपजाऊता के एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है और इसलिए इसे जंगल वासियों के बीच शुभ माना जाता है। अतः यह ऊपरी जाति द्वारा बनाई गई परंपरा है कि मासिक धर्म से गुजरने वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।

मंदिर परिसर में महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध सन् 1991 में एस. महेन्द्रन बनाम सचिव, त्रावणकोण वाद में उच्च न्यायालय के निर्णय में सामने आया।

न्यायालय में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दिए गए तर्क

  • यह देवता के ब्रह्मचर्य और पवित्रता दोनों को खंडित करेगा।
  • मंदिर की अपनी स्वयं की परंपराएँ और रीति-रिवाज हैं जिनका आदर किया जाना चाहिए। यह किसी दूसरे सार्वजनिक स्थल के ही समान है और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन नहीं करता है।
  • सबरीमाला के श्रृद्धालुओं को तीर्थयात्रा के लिए 41 दिनों के ब्रह्मचर्य से गुजरना जरूरी होता है। महिलाओं के लिए इस तरह के व्रत का पालन करना मुश्किल होगा।
  • संविधान का अनुच्छेद 25(2) सार्वजनिक हिंदु धार्मिक संस्थानों तक समाज की सभी जातियों और वर्गों तक पहुँच प्रदान करता है। हालांकि, यह केवल सामाजिक कल्याण और सुधारों के लिए लागू है लेकिन मंदिरों के धार्मिक रीति-रिवाजों और पूजा अभ्यासों के लिए लागू नहीं है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26(b) प्रत्येक धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक मामलों का स्वयं निपटारा करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • रितु प्रसाद शर्मा बनाम असम राज्य, 2015 मामले में गुवाहटी उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत आने वाले धार्मिक रीति-रिवाज भारतीय संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के तहत चुनौती देने से संरक्षित हैं।
  • केरल हिंदु सार्वजनिक पूजास्थल (प्रवेश की अनुमति) नियम, मासिकधर्म से गुजरने वाली महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से रोकता है।

न्यायालय में महिलाओं का प्रवेश हटाने के पक्ष में दिए गए तर्क

  1. नैतिक तर्क:
  • भगवान एक प्राकृतिक घटना के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों करेगा?
  • एक भक्त आखिर कैसे भगवान को खंडित और किसी संत की पवित्रता को नुकसान पहुंचा सकता है?
  • मासिकधर्म वाली महिलाओं के बारे में कुछ भी अशुद्ध नहीं होता है।
  1. कानूनी तर्क
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के धर्म का पालन करने और उस अधिकार के तहत मंदिर या मस्जिद में पूजा करने का अधिकार देता है।
  • भारत में अयपन्न मंदिरों की संख्या हजारों में है जहाँ महिलाओं को रोकने का यह नियम नहीं है। महिलाएँ घरों में भी भगवान अयपन्न की पूजा करती हैं। पूजा की यह परंपरा बहुत पुरानी है।
  • लिंग के आधार पर भेदभाव अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) के तहत मौलिक अधिकारों का हनन करता है। इसलिए, सबरीमाला मंदिर में मासिकधर्म महिलाओं को पूजा से रोकने की यह प्रथा असंवैधानिक है।
  • जीववैज्ञानिक संरचना के कारण महिलाओं के प्रवेश को रोकना एक अपमानजनक प्रथा है जो अनुच्छेद 51A (e) में निहित महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक प्रथाओं को त्यागने के मौलिक कर्तव्य का हनन करती है।
  • सबरीमाला मंदिर न्याय का वित्तपोषण केरल सरकार की समेकित निधि से होता है। इसलिए, यह एक सार्वजनिक पूजास्थल है, न कि पुजारियों की संपत्ति है।
  • हिंदु जीवनशैली पुजारियों द्वारा बनाए गए संकीर्ण और विभेदकारी रीति-रिवाजों द्वारा निर्धारित नहीं हो सकती है और न ही होनी चाहिए।
  • धार्मिक परंपराओं को समय में बंद नहीं रहना चाहिए और प्रासंगिक बने रहने के लिए उनमें अवश्य सुधार लाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय का फैसला

उच्चतम न्यायालय ने 4-1 बहुमत के निर्णय से केरल हिंदु सार्वजिक पूजा स्थल निर्णय, 1965 को स्थगित कर दिया। इसने सभी आयुवर्ग की महिलाओं के लिए सबरीमाला मंदिर में प्रवेश और पूजा को कानूनी करार दिया।

न्यायालय का फैसला

  • त्रावणकोण देवस्वाम बोर्ड ने कहा कि अयपन्न भक्तों का एक धार्मिक प्रभुत्व है और उन्हें अपने खुद के नियम बनाने की अनुमति दी गई थी। उच्चतम न्यायालय ने इस दावे को सीधे खारिज कर दिया।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का बहिष्कार हिंदु धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है। इसलिए, न्यायालय एक विभेदकारी रिवाज पर प्रतिबंध लगाने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।
  • अनुच्छेद 14,15 और 17 अनुच्छेद 26 के अंतर्गत विभेदकारी प्रथाओं पर भारी है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता का सिद्धांत अतार्किक और अबौद्धिक रिवाजों से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • न्यायालय ने घोषणा की कि मासिकधर्म के आधार पर महिलाओं का विभेदन एक प्रकार की छुआछूट है।
  • उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया कि मध्यकालीन शुद्धता और प्रदूषण दृष्टिकोण के आधार पर महिलाओं को कलंकित करना अवैज्ञानिक और अमानवीय है, और इसलिए, आधुनिक समय में व्यवहार योग्य नहीं है।

अतः उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऐसा कोई धार्मिक रीति-रिवाज जो महिलाओं के साथ उनकी जीववैज्ञानिक संरचना के आधार पर भेदभाव एवं पृथक्करण करता है, असंवैधानिक है।

विरोधी राय

इसके विरोध में एकमात्र राय एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की तरफ से आयी। अपने व्यापक रूप से चर्चित मतभेद में, उन्होंने कहा कि

  • धार्मिक मामलों को धार्मिक समुदायों के हवाले छोड़ देना चाहिए और न्यायालय को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। यह विवाद कारण से जुड़ा न होकर, विश्वास से जुड़ा है, इसलिए, न्यायालय को उनके निर्णय का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
  • धार्मिक विश्वास और संविधान के समानता के सिद्धांत के बीच एक संतुलन बनाए जाने की जरूरत है।
  • उन्होंने निर्णय के भविष्य के परिणामों के प्रति सावधान किया और इससे आंशकाओं का पिटारा खुल जाएगा।

निर्णय की समीक्षा

हालांकि, न्यायालय ने 3-2 बहुमत से सबरीमाला मंदिर की समीक्षा याचिका को स्वीकार किया। उन्होंने इस मामले को 7 न्यायाधीश पीठ में भेज दिया। अपने तीन तलाक निर्णय के बाद, महिलाओं के मुद्दे पर एक दूसरा विवाद एक बड़े मुद्दे को जन्म देगा कि क्या धार्मिक प्रथा अपने भक्तों के बीच जाति या लिंग के आधार पर अंतर कर सकती है।

उच्चतम न्यायालय की बड़ी पीठ को अपने “अनिवार्य धार्मिक अभ्यास परीक्षण” सिद्धांत की पुनर्समीक्षा भी करनी होगी।

नोट – अनिवार्य धार्मिक अभ्यास परीक्षण :

अनिवार्यता का सिद्धांत एक निरंतर और बहु-विवादित सिद्धांत है जिसकी व्याख्या उच्चतम न्यायालय ने सन् 1954 के शिरुर मुट मामले में की थी। न्यायालय ने निर्णय दिया था कि “धर्म” में सभी रीति-रिवाज और प्रथाएँ शामिल होती हैं, और अनिवार्य तथा गैर-अनिवार्य प्रथाओं का निर्धारण करना न्यायालय के विवेक पर है। इसमें वे भी प्रथाएँ शामिल हैं जो धर्म का एक अभिन्न अंग हैं।

डॉ. एम. इस्माइल फारुकी और अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (1994) में, पांच न्यायधीशों की संवैधानिक पीठ ने निर्णय दिया “मस्जिद इस्लाम धर्म की प्रथा का एक अनिवार्य भाग नहीं है।“ यह भी निर्णय दिया गया कि मुसलमानों द्वारा दी जाने वाली नमाज़ कहीं भी अदा की जा सकती है, खुले स्थानों पर भी।

कई संविधान विशेषज्ञों द्वारा इस अत्यंत व्यक्तिपरक सिद्धांत की इसके लागू होने के बाद से काफी आलोचना की है। इसका कारण है कि अनिवार्यता के परीक्षण ने न्यायालय को ऐसे क्षेत्र में लाकर खड़ा कर दिया है जो उसकी विशेषज्ञता के बाहर का क्षेत्र है और न्यायधीशों को विश्वास के मामलों की व्याख्या करने की शक्ति प्रदान करेगा। पूर्णतः धार्मिक मुद्दों पर बहस करना न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से पूरी तरह बाहर है जोकि कारण और सबूत के आधार पर कार्य करता है न कि विश्वास के आधार पर।

यह डर सही साबित हुआ क्योंकि न्यायालय इस सवाल पर नियत नहीं रह सका। क्योंकि कुछ मामलों में, न्यायालय ने अनिवार्यता के सिद्धांत को निर्धारित करने के लिए धार्मिक ग्रंथों पर भरोसा किया है, जबकि कुछ मामलों में, उसने श्रृद्धालुओं के व्यवहार (परंपरा) पर भरोसा किया है। सबरीमाला जैसे मामलों में, न्यायालय ने इसे पूर्ण तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा है।

निष्कर्ष: सबरीमाला मुद्दे का महत्व

सबरीमाला विवाद के कारण जीवन के विभिन्न पक्षों में महिलाओं के बहिष्कार का मुद्दा राष्ट्रीय प्रकाश में सामने आया। न्यायालय ने प्रगतिवादी निर्णय देते हुए समाज में व्यवहारात्मक परिवर्तन और धार्मिक मामलों में सुधार का रास्ता खड़ा किया है। यह निर्णय भविष्य के मामलों के लिए नजीर होगा और संविधान की अधिक व्यापक व्याख्या प्रदान करेगा। यह लोगों की जाति, लिंग और धर्म में अपने नागरिक अधिकारों के संबंध में जागरूकता को बढ़ाएगा। 

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