लॉर्ड कर्ज़न, Lord Curzon in Hindi - लॉर्ड कर्जन कौन था, नीतियां , भारत के आंदोलन में भूमिका

By Brajendra|Updated : November 14th, 2022

जॉर्ज नथानिएल कर्जन, जिसे आमतौर पर लॉर्ड कर्जन के नाम से जाना जाता है, को 1899 से 1905 तक भारत का सबसे महत्वपूर्ण वायसराय (Viceroy) माना जाता है।1899 ई. में लॉर्ड एलगिन द्वितीय के बाद लॉर्ड कर्ज़न भारत का वाइसराय बनकर आया था। भारत का वाइसराय बनने के पूर्व भी कर्ज़न चार बार भारत आ चुका था। भारत में वाइसराय के रूप में उसका कार्यकाल काफ़ी उथल-पुथल का रहा है। लॉर्ड कर्ज़न के विषय में पी.राबटर्स ने लिखा है कि, "भारत में किसी अन्य वाइसराय को अपना पद सम्भालने से पूर्व भारत की समस्याओं का इतना ठीक ज्ञान नहीं था, जितना कि लॉर्ड कर्ज़न को। कर्ज़न ने जनमानस की आकांक्षाओं की पूर्णरूप से अवहेलना करते हुए भारत में ब्रिटिश हुकूमत को पत्थर की चट्टान पर खड़ा करने का प्रयास किया"। लॉर्ड कर्ज़न ने भारत में शिक्षा और आर्थिक सुधारों के लिए मुख्य रूप से कार्य किये थे। भूमि पर लिये जाने वाले भूमिकर को और अधिक उदार बनाये जाने हेतु उसने 'भूमि प्रस्ताव' भी पारित किया था।

बंगाल को दो प्रांतों में विभाजित करने के अपने विवादास्पद निर्णय के लिए कर्जन को भारतीय इतिहास में याद किया जाता है। इस लेख में हम आपको वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न (Viceroy Lord Curzon Hindi me) के समय सुधार और प्रशासन के बारे में सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। उम्मीदवार नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करके वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न के समय सुधार और प्रशासन से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी का पीडीएफ़ हिंदी में डाउनलोड कर सकते हैं।

Table of Content

लॉर्ड कर्ज़न कौन थे? Lord Curzon Kon The?

  • जॉर्ज नथानिएल कर्ज़न इंग्लैंड के एक ब्रिटिश राजनेता और विदेश सचिव थे, जिन्होंने भारत में अपने वाइसरॉय कार्यकाल के दौरान ब्रिटिश नीति निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • लॉर्ड कर्ज़न वर्ष 1899 से 1905 तक ब्रिटिश भारत के वाइसरॉय रहे।जी कि 39 वर्ष की आयु में भारत के सबसे कम उम्र के वायसराय बने थे ।
  • कर्ज़न का वाइसरॉय कार्यकाल सर्वाधिक विवादास्पद रहा है , कर्ज़न को भारत का सर्वाधिक अलोकप्रिय वाइसरॉय के रूप में जाना जाता है।
  • लॉर्ड कर्ज़न एक निरंकुश शासक या कट्टर नस्लवादी था और यह भारत में ब्रिटेन की "सभ्यता मिशन" के प्रति ढृढ़ था।
  • लॉर्ड कर्ज़न ने भारतीयों को "चरित्र, ईमानदारी और क्षमता में असाधारण हीनता या कमी " के रूप में वर्णित किया है।
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लॉर्ड कर्जन के सुधार कार्य |Lord Curzon's Reform Work in Hindi

वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न के द्वारा किये गये कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार कार्य इस प्रकार हैं :-

पुलिस सुधार

लार्ड कर्ज़न ने 1902 ई. में 'सर एण्ड्रयू फ़्रेजर' की अध्यक्षता में एक 'पुलिस आयोग' की स्थापना की। फ़्रेजर आयोग ने 1903 ई. में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में पुलिस विभाग की आलोचना करते हुए कहा कि, यह विभाग पूर्णतः अक्षम, अप्रशिक्षित, भ्रष्ट एवं दमनकारी है। आयोग के सुझावों के आधार पर सभी स्तरों में वेतन की वृद्धि , प्रशिक्षण की व्यवस्था, प्रान्तीय पुलिस की स्थापना व केन्द्रीय गुप्तचर विभाग की स्थापना हुई।

Lord Curzon in Hindi PDF

शैक्षिक सुधार

कर्ज़न ने 1902 ई. में 'सर टॉमस रैले' की अध्यक्षता में 'विश्वविद्यालय आयोग' का गठन किया। आयोग के सुझावों के आधार पर विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 ई. पारित किया गया। जिसमे विश्वविद्यालय पर सरकारी नियन्त्रण बढ़ा दिया गया। विश्वविद्यालय की सीनेट में मनोनीत सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। गैर सरकारी कॉलेजों का विश्वविद्यालयों से सम्बन्धित होने के नियम को कठोर बना दिया गया।  

आर्थिक सुधार

लार्ड कर्ज़न ने 1899-1990 ई. में पड़े अकाल व सूखे की स्थिति के विश्लेषण के लिए 'सर एण्टनी मैकडॉनल' की अध्यक्षता में एक 'अकाल आयोग' गठित किया। आयोग के अनुसार, अकाल सहायता व अनुदान में दी गई सहायता को अनावश्यक बताया गया। आयोग ने कहा कि, कार्य करने में सक्षम लोगों को उनके कार्य में ही सहयोग करना चाहिए।

सिंचाई आयोग की स्थापना

भूमिकर को अधिक उदार बनाने हेतु लॉर्ड कर्ज़न द्वारा 16 जनवरी, 1902 को 'भूमि प्रस्ताव' लाया गया। कर्ज़न ने 1901 ई. में 'सर कॉलिन स्कॉट मॉनक्रीफ़' की अध्यक्षता में एक 'सिंचाई आयोग' का भी गठन किया और आयोग के सुझाव पर सिंचाई के क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार किये। 

कृषि एवं सहकारी क्षेत्र में सुधार 

1904 ई. में 'सहकारी उधार समिति अधियिम' आया , जिसमें कम ब्याज दर पर उधार की व्यवस्था की गयी। इसके अतिरिक्त एक 'साम्राज्यीय कृषि विभाग' की स्थापना की गई , जिसमें कृषि, पशुधन एवं कृषि के विकास के लिए वैज्ञानिक प्रणाली के प्रयोग को प्रोत्साहित किया गया। वाणिज्य एवं उद्योग के क्षेत्र में सुधार हेतु एक नवीन विभाग खोला गया, जो डाक तार, रेलवे प्रशासन, कारखाने, बन्दरगाहों आदि पर नज़र रखता था।

टंकण व पत्र मुद्रण अधिनियम

लार्ड कर्ज़न के समय 1899 ई. में पारित किये गये 'भारत टंकण व पत्र मुद्रण अधिनियम' द्वारा अंग्रेज़ी पौण्ड को भारत में विधिग्राह्य बना दिया गया। एक अन्य योजना 'स्वर्ण विनिमय प्रमाप योजना' के अन्तर्गत सरकार को सोने के बदले रुपये देने होते थे।

रेलवे का विकास

लॉर्ड कर्ज़न के समय में ही भारत में सर्वाधिक रेलवे लाइनों का निर्माण हुआ। लॉर्ड कर्ज़न ने इंग्लैण्ड के रेल विशेषज्ञ 'राबटर्सन' को भारत बुलाया था, उन्होंने वाणिज्य उपक्रम के आधार पर रेल लाइनों के विकास पर बल दिया। 

न्यायिक सुधार

लार्ड कर्ज़न ने 'कलकत्ता उच्च न्यायालय' में न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ा दिया और उसने उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन एवं पेंशन में वृद्धि की। उसने भारतीय नागरिक प्रक्रिया संहिता को संशोधित करते हुए उसे परिवर्तित कर दिया।

सैनिक सुधार 

लॉर्ड कर्ज़न ने ब्रिटिश सेनापति 'किचनर' के सहयोग से सेना का पुनर्गठन किया। इसने भारतीय सेना को उत्तरी व दक्षिणी कमानों में बांट दिया । उत्तरी कमान ने अपना कार्यालय 'मरी' में एवं 'प्रहार केन्द्र' पेशावर में तथा दक्षिणी कमान ने अपना कार्यालय 'पूना' में एवं 'प्रहार केन्द्र' क्वेटा में स्थापित किया। सैन्य अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए 'केम्बरले कॉलेज' के नमूने पर क्वेटा में एक कॉलेज की स्थापना की गई। तत्कालीन सैन्य टुकड़ियों को  महत्त्वपूर्ण 'किचनर परीक्षण' से गुज़रना होता था। इस सैन्य पुनर्गठन के कारण कर्ज़न के समय में सेना पर ख़र्च अत्यधिक बढ़ गया था।

प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम

'प्राचीन स्मारक संरक्षण अधियम', 1904 ई. के द्वारा लॉर्ड कर्ज़न ने भारत में पहली बार ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा एवं मरम्मत की ओर ध्यान देते हुए 50,000 पौण्ड की धनराशि का आबंटन किया। इस कार्य के लिए लॉर्ड कर्ज़न ने 'भारतीय पुरातत्त्व विभाग' की स्थापना की।

कलकत्ता निगम अधिनियम

लॉर्ड कर्ज़न ने 'कलकत्ता निगम अधिनियम' 1899 ई. के द्वारा चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या में कमी कर दी, परन्तु निगम एवं उसकी समितियों में अंग्रेज़ लोगों की संख्या बढ़ा दी गई। जिस कारण कलकत्ता नगर निगम मात्र एक 'ऐंग्लो-इण्डियन' सभा के रूप में ही रह गया। 28 चुने गये सदस्यों द्वारा इसका विरोध करने पर भी लॉर्ड कर्ज़न विचलित नहीं हुआ, और 1903 ई. में एक भोज के दौरान उसने कहा, "मैं वाइसराय पद से निवृत होने के पश्चात् कलकत्ता नगर निगम का महापौर होना पसन्द करूँगा"।

लॉर्ड कर्जन और बंगाल विभाजन अधिनियम 1905 | Partition of Bengal 1905 in Hindi

  • लॉर्ड कर्ज़न के देश विरोधी कार्यों में सबसे प्रमुख कार्य 1905 ई. में 'बंगाल का विभाजन' था। कर्ज़न ने राष्ट्रीय आंदोलन को दबाने व कमज़ोर करने के उदेश्य से, प्रशासनिक असुविधाओं का आरोप लगाकर बंगाल को दो भागों में बांट दिया था।
  • पूर्वी भाग में बंगाल और असम के चटगाँव, ढाका, राजशाही को मिलाकर एक नया प्रान्त बनाया गया। इस प्रान्त का मुख्य कार्यालय ढाका में था।
  • पश्चिमी भाग में पश्चिम बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा को सम्मिलित किया गया था।
  • लॉर्ड कर्ज़न का यह विभाजन 'फूट डालो और राज्य करो' की नीति पर आधारित था। उसने इस कार्य के द्वारा हिन्दू और मुसलमानों में मतभेद पैदा करने का प्रयास किया।
  • बंगाल का विभाजनअन्तिम रूप से 16 अक्टूबर, 1905 ई. को सम्पन्न हुआ था।
  • इस विभाजन का विरोध पूरे देश में हुआ, दिल्ली दरबार में जॉर्ज पंचम ने 1911 ई. में बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की। और यह विभाजन समाप्त हो गया था।

 

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वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न के समय सुधार और प्रशासन FAQs

  • लार्ड कर्जन को 1899 में भारत के वायसराय के रूप में नियुक्त किया गया था, और वे 1905 तक भारत के वायसराय बने रहे।

  • लॉर्ड कर्जन ने राष्ट्रीय आंदोलन को दबाने व कमज़ोर करने के उदेश्य से, प्रशासनिक असुविधाओं का आरोप लगाकर 1905 ई. में बंगाल विभाजन की घोषणा की थी। 

  • लार्ड कर्जन ने 1905 में ''फूट डालो और शासन करो की नीति का अनुसरण करते हुए बंगाल को दो भागों में विभाजित करने की घोषणा की। उसने बंगाल की जनता की एकता को आघात पहुँचाने और वहाँ के हिन्दुओं और मुसलमानों में सदैव के लिए फूट डालने के उद्देश्य से बंगाल विभाजन का कुटिल षड़यंत्र रचा था। 


  • लार्ड कर्जन का सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी कार्य कौन सा कृषि सम्बन्धी सुधार है। लॉर्ड कर्जन ने भारतीय कृषकों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए कृषि बैंकों और सहकारी समितियों की स्थापना की तथा लोगों में पारस्परिक सहयोग की भावना जाग्रत करने का प्रयास किया। कृषकों की दशा सुधारने के लिए उसने सन् 1902 में 'पंजाब भूमि हस्तान्तरण नियम' भी पारित किया।

  • लॉर्ड कर्जन भारत के वायसराय 1899 में बने थे। उन्हें 1904 वायसराय के रूप में फिर से नियुक्त किया गया था और इसी के बाद 1905 में उन्होंने भारत में राष्ट्रवाद के बढ़ते ज्वार को दबाने के लिए बंगाल के विभाजन (Partition of Bengal) की अध्यक्षता की। वह केवल 39 वर्ष की आयु में भारत वायसराय बने।

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