Issues Of Buffer Stocks

By Hemant Kumar|Updated : December 11th, 2019

 बफर स्टॉक जारी करना

खाद्य सुरक्षा को पूरा करने और अप्रत्याशित आपातकाल से निपटने के लिए कुछ निश्चित वस्तुओं (जैसे चावल, गेहूं आदि) का संग्रह सरकार द्वारा किया जाता है, जिसे बफर स्‍टॉक कहते हैं। खाद्य स्टॉक बफरिंग को पहली बार 1969 में चौथी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत शुरू किया गया था। सरकार ने खाद्य निगम अधिनियम 1964 के अंतर्गत इस आशा से भारतीय खाद्य निगम की स्थापना की थी कि इसके माध्‍यम से सरकार की खाद्य नीति के उद्देश्‍यों को प्राप्‍त किया जा सकता है। वर्तमान में, सरकार की ओर से भारतीय राष्‍ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (NAFED), लघु किसान कृषि व्‍यापार संघ (SFAC) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) आदि बफर स्‍टॉक की खरीद और प्रबंधन करते हैं।

लक्ष्य:

  1. बफर स्‍टॉक को तनावपूर्ण और कठिन राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक और प्राकृतिक स्थितियों में प्रत्‍येक नागरिक के लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विनियमित किया जाता है, इस प्रकार यह भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  2. अंतर्राष्ट्रीय मूल्य अस्थिरता, फसल की विफलता, प्राकृतिक आपदा आदि जैसे अनपेक्षित आपातकाल से निपटना
  3. सार्वजनिक वितरण योजनाओं और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का सुचारू कार्यान्वयन
  4. खुले बाजार में मूल्य स्थिरीकरण
  5. किसानों के हितों की रक्षा करने हेतु प्रभावी मूल्य समर्थन अभियान

लाभ:

  • बफर स्टॉक, खाद्य आत्मनिर्भरता और सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण है। बफर स्टॉक फसल की विफलता, बाढ़, सूखा, युद्ध और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिए लचीलापन प्रदान करता है।
  • अतिरिक्त वस्तुओं की खरीद के माध्यम से खाद्य मुद्रास्फीति की जांच करते रहें और जब कीमतें बढ़ जाती हैं तो इन्‍हें जारी करें।
  • संपूर्ण भौगोलिक स्थानों में मानव की मूलभूत आवश्यकता की उपलब्धता, पहुंच, उपयोगिता और स्थिरता के माध्यम से खाद्य सुरक्षा प्राप्‍त करना।
  • दोनों स्थितियों में किसानों का समर्थन करता है:
  1. अधिक उत्पादन के मामले में कीमतों में गिरावट न होना
  2. एम.एस.पी. के माध्यम से वास्तविक मूल्य वसूल करना
  • बफर स्टॉक, विभिन्न सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए आधार स्टॉक और आवश्यक स्टॉक की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।
  • इसके अतिरिक्‍त, इस प्रकार की भविष्यवाणी वस्तुओं के आयात-निर्यात हेतु नीतियां के निर्माण और निर्णय लेने में मदद करती है।

चुनौतियां

  • खाद्य जैसे खराब होने वाले उत्पादों को बहुत लंबे समय तक संग्रहीत नहीं किया जा सकता है। इसलिए यदि ठीक ढंग से इसका चक्रण नहीं किया जाता है तो इसके परिणामस्वरूप अपव्यय होगा।
  • बफर स्टॉक मानकों के संबंध में स्टॉक का स्तर बहुत अधिक है, जिसके परिणामस्वरूप भंडारण, उत्पादन के मूल्य पर ब्याज और अपव्यय के संदर्भ में भारी लागत आती है।
  • अमेरिका जैसे विदेशी देश बफर स्टॉक को व्यापार-विकृत प्रथाओं के रूप में मानते हैं और भारत को डब्ल्यू.टी.ओ. तक खींचते हैं।
  • कुछ अर्थशास्‍त्रियों के अनुसार, कीमतों को भंडारण के बजाय व्यापार के माध्यम से स्थिर किया जा सकता है और व्यापार, भंडारण की तुलना में बहुत सस्ता है।
  • एम.एस.पी. के साथ बफर स्टॉक को एकीकृत करने से उपयोगिता की वस्‍तुओं की खरीद अधिक खरीद हो जाएगी और इससे अति-उत्पादन होता है जिसके कारण अधिकता होती है जो न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि पर्यावरण को भी प्रभावित करता है।
  • यहां पर रसद और प्रशासन की लागत अधिक है। भंडारण को खरीदने के लिए आवंटित अधिकांश धन के साथ यह कृषि मंत्रालय और एफ.सी.आई. के लिए परेशानी का सबब बन जाता है कि बफर स्‍टॉक इकाईयों की कुशल स्‍थापना और कार्य हेतु सभी चीजों को उपलब्‍ध कराने हेतु बजट को व्‍यवस्‍थित किया जाए। चुनौतियां आगे चलकर परिचालन सीमाओं तक पहुंच गई हैं।
  • दोहरी विफलता- नुकसान: गैर-वैज्ञानिक भंडारण विधियों के कारण बड़ी मात्रा में स्टॉक खराब हो जाते हैं और साथ ही भारत में बड़ी संख्या में आबादी भूख से मर रही है।
  • भण्डारण: खरीद के बाद खाद्यान्न भंडारण के लिए जगह और बुनियादी ढाँचे की कमी
  • अपव्यय: खुले में भंडारण, कृन्तकों, जलवायु परिवर्तन और प्रशासन में देरी, खराब आपूर्ति, श्रृंखला प्रबंधन के कारण
  • परिवहन: परिवहन के समय भारी लागत, खर्च और खराब होने जैसी समस्याएं
  • डायवर्सन: खाद्यान्न को काला बाज़ारों, शराब उत्पादन, भूत लाभार्थियों आदि को दे दिया जाता है।
  • संतुलन संबंधी समस्या: आपातकाल और पी.डी.एस. के लिए समग्र बफर स्टॉक आवश्यकता हेतु उचित भविष्यवाणी न होना

इसे काबू कैसे करें?

शांताकुमार समिति के अनुसार,

  • खरीद प्रणाली के प्रभारी राज्य को पी.एम.-आशा, टी.ओ.पी.एस जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अपने प्रयासों को पूरक बनाना।
  • केंद्र सरकार को राज्यों में इंड टू इंड कम्प्यूटरीकरण, बॉयोमीट्रिक सत्यापन और उत्‍पादों के भौतिक उत्थान, लाभार्थियों के भूत को समाप्त करने के माध्यम से एन.एफ.एस.ए. के कार्यान्वयन में तेजी लानी चाहिए और पी.डी.एस. से चोरी की जांच हेतु सतर्कता समितियों का गठन करना चाहिए।
  • सरकार को वर्तमान में लाभार्थियों को 67% से 40% तक नीचे लाना चाहिए।
  • एफ.सी.आई. को अपने भंडार संचालन को विभिन्न एजेंसियों जैसे केंद्रीय भंडारण निगम, राज्य भंडारण निगम और निजी उद्यमी गारंटी (पी.ई.जी.) योजना के अंतर्गत निजी क्षेत्र और यहां तक ​​कि राज्य सरकारों को आउटसोर्स करना चाहिए।
  • भंडारण सुविधाओं, परिवहन आदि सुविधाओं को पी.एम.-संपदा जैसी योजनाओं के माध्यम से बढ़ाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

  1. खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में बफर स्टॉक, भोजन तक सुरक्षित और व्यवहार्य पहुंच प्रदान करता है। इसलिए गरीबी के साथ भुखमरी को कम करना देश के सामाजिक-आर्थिक विकास का एक दीर्घकालिक हित है।
  2. टी.पी.डी.एस., राशन और उचित मूल्य की दुकान, एम.एस.पी., मध्याह्न भोजन योजना, प्राकृतिक आपदा राहत, एकीकृत बाल विकास सेवा, एस.सी./ एस.टी. और आदिवासी छात्रावास आदि के साथ बफर स्टॉक को एकीकृत करने से कमजोर क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा मिलती है। इस प्रकार यह समाज के समग्र विकास के संवैधानिक और नैतिक दायित्व को पूरा करता है।
  3. बफर स्टॉक के संचालन प्रबंधन में दक्षता सामाजिक, आर्थिक और संवैधानिक दायित्व के बीच पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को लाएगी। नवीनतम तकनीक, विवेकपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और बुनियादी ढांचे के विकास से बफर स्टॉक की लागत में कमी आएगी।

अन्य तथ्य:

  1. यू.एन.-इंडिया ने अनुमान लगाया है कि भारत में लगभग 195 मिलियन लोग कुपोषित हैं।
  2. विश्व खाद्य सुरक्षा सूचकांक में दुनिया के 113 प्रमुख देशों में से भारत को 74वें स्थान पर रखा है। भारत में औसत प्रोटीन का सेवन आवश्यक प्रोटीन पोषण का केवल 20% है।
  3. एफ.सी.आई. की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत में 1 अक्टूबर, 2017 को 46 मिलियन टन का अनाज का भंडार था, जो बफर मानदंड से 53% अधिक है।
  4. 2015 के नवीनतम बफर मानदंडों में सुधार के अनुसार, वर्तमान क्षमताओं में 1 जुलाई को 1 मिलियन टन गेहूं और चावल और प्रत्‍येक वर्ष 1 अक्टूबर को 30.7 मिलियन टन शामिल होगा।
  5. खाद्य सुरक्षा के तीन महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनमें भोजन की उपलब्धता, भोजन तक पहुंच और भोजन का अवशोषण शामिल है।

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