भारत की विदेश नीति - उद्देश्य, विशेषताएं

By Trupti Thool|Updated : September 2nd, 2022

भारत की विदेश नीति: विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में एक राष्ट्र के उत्पन्न भारत ने अन्य सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने और शांति के रखरखाव के माध्यम से सुरक्षा के उद्देश्य से अपने विदेशी संबंधों का संचालन करने का निर्णय लिया था । विदेश निति का यह उद्देश्य राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में सम्मिलित भी है।
विदेशी नीति उन उद्देश्यों ,योजनाओं तथा क्रियाओं का सामूहिक रूप है जो एक राज्य अन्य राज्यों से अपने हित और बेहतर संबंधों को संचालित करने के लिए करता है।
इस लेख के माध्यम से आप जानेंगे की विदेश नीति क्या है, विदेश नीति के उद्देश्य और विदेश नीति क्यों लागू की गयी थी। भारत में विदेश नीति के क्या प्रभाव हैं? इन सभी जानकारी को आपके साथ इस लेख के माध्यम से साझा कर रहे हैं।

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भारत की विदेश नीति

विदेश नीति किसी भी राज्य की गतिविधियों को एक व्यवस्थित रूप प्रदान करता है। साधारण शब्दों में विदेश नीति का उद्देश्य किसी राज्य का अन्य राज्यों से सम्बन्ध बनाना, अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप और पहचान रखना, अंतराष्ट्रीय परिस्थितियों का आकलन करना है। गौरतलब है कि सभी देशों की विदेश नीति मुख्य उद्देश्य स्वयं का हित होता है। अतः भारत की विदेश नीति का भी मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हित है। भारत के विदेश नीति निर्माताओं ने अंतराष्ट्रीय समन्वय और सम्बन्ध बनाने हेतु कुछ सिद्धांतों का निर्माण किया था। इन्हीं सिद्धांतों को आधार मानकर भारत की विदेश नीति का निर्माण किया गया हैं।

1947 से 1964 तक नेहरू की विदेश नीति 

जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत उन्नत राज्यों की तुलना में निर्धारित लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ना चाहता था। वे अपने ही पड़ोस में शांति और विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित था। इसके अलावा, अधिक शक्तिशाली राज्यों पर उनकी आर्थिक और सुरक्षा निर्भरता कभी-कभी उनकी विदेश नीति को प्रभावित करती थी। आजादी के बाद, नेहरू ने राष्ट्रमंडल राष्ट्रों में भारत की सदस्यता जारी रखने का निर्णय लिया। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और अन्य देशों (दोनों विकसित और विकासशील) के साथ मैत्रीपूर्ण और सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने की कोशिश की।

गुटनिरपेक्ष की नीति

  • प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने 1946 से 1964 तक भारत की विदेश नीति के निर्माण और कार्यान्वयन में गहरा प्रभाव डाला। 
  • नेहरू की विदेश नीति के तीन प्रमुख उद्देश्य थे- 
    • परिश्रमी संप्रभुता, 
    • क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना और 
    • तेजी से आर्थिक विकास को बढ़ावा देना। 
  • नेहरू ने इन उद्देश्यों को हासिल करने हेतु गुटनिरपेक्ष की नीति को अपनाया।
  • स्वतंत्र भारत की विदेश नीति ने शीत युद्ध के तनाव को कम करके और दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में मानव संसाधनों का योगदान देकर, गुटनिरपेक्षता की नीति की वकालत करके एक शांतिपूर्ण दुनिया का उद्देश्य प्रस्तुत किया।
  • नेहरु के नेतृत्व में, भारत ने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के पांच महीने पहले अर्थात मार्च 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन का आयोजन किया। 
  • भारत विखंडन प्रक्रिया का कट्टर समर्थक था और दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद, विशेष रूप से रंगभेद का दृढ़ता से विरोध करता था। 
  • इंडोनेशियाई शहर बांडुंग में 1955 में आयोजित बांडुंग सम्मेलन ने नए स्वतंत्र एशियाई और अफ्रीकी देशों के साथ भारत के संबंधो को बढ़ाव दिया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) को इसके परिणामस्वरुप गठित किया गया और इसके पहले शिखर सम्मेलन के रूप में सितंबर 1961 में बेलग्रेड में आयोजित किया गया था।

भारत-चीन संबंध

  • जवाहरलाल नेहरू ने महसूस किया कि भारत और चीन पश्चिमी वर्चस्व को पीछे छोड़कर खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करेंगे।
  • नेहरू ने भविष्य में संभावित चीनी हमले के बारे में वल्लभभाई पटेल के विचार को दरकिनार कर दिया। 29 अप्रैल 1954 को, भारत और चीन ने पंचशील (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत) समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों की दिशा में एक कदम माना गया। 
  • 1962 में, भारत-चीन युद्ध ने देश और विदेश में भारत की छवि को धूमिल किया। भारत के समर्थन में कोई भी प्रमुख देश सामने नहीं आया। 
  • नेहरू के रक्षा मंत्री, वी. कृष्णा मेनन ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और युद्ध में हार के कारण नेहरू की प्रतिष्ठा में भी कमी आई, क्योंकि चीनी इरादों को भापने और सैन्य तैयारी की कमी के कारण उनकी कड़ी आलोचना की गई थी। 
  • पहली बार, लोकसभा में नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और इस पर बहस हुई।

भारत-पाकिस्तान संबंध

  • जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान के प्रति सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाया। 1950 का नेहरू-लियाकत समझौता दो देशों अपर बाध्यकारी रूप से क्रियान्वित किया गया जिसका लक्ष्य दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना था। 
  • 1948 में भारत पर पाकिस्तान के हमले के साथ देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों की स्थापना शुरू हुई और दोनों देश में अंततः संघर्ष विराम हुआ, जिसके परिणामस्वरूप जम्मू और कश्मीर का कुछ हिस्सा (जिसे पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर कहा जाता है) पाकिस्तान के प्रभुत्व में आ गया। 
  • 1948 में, दोनों देशों ने अंतर-डोमिनियन समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत भारत को वार्षिक भुगतान के बदले में पाकिस्तानी को पानी उपलब्ध कराना था। लेकिन दोनों देश समझौते का समापन करने में विफल रहे।
  • 1954 में, भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल के वितरण के लिए, विश्व बैंक ने दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि को लागू किया, जिस पर प्रधान मंत्री 1960 में जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के परिणामस्वरूप एक स्थायी सिंधु आयोग बनाया गया था।

भारतीय विदेशी नीति की विशेषताएं

  • भारत की विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता की नीति है। देश के सर्वांगीण विकास के लिए गुट विशेष तक सीमित न रहकर गुट-निरपेक्ष की नीति को अपनाना भारत की सर्वोपरि नीति है।
  • भारत के द्वारा सभी राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये गए हैं। भारत द्वारा न केवल पडोसी देशों से बल्कि सभी देशों से आर्थिक, राजनीतिक, व्यापारिक तथा सामाजिक रूप से भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखे हुए है।
  • भारत की विदेश नीति की अन्य एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना है। शांति पूर्ण सहअस्तित्व का आधार पंचशील के सिद्धांत हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक राष्ट्र के स्वतन्त्र अस्तित्व को पूर्ण मान्यता, प्रत्येक राष्ट्र को अपने भाग्य का निर्माण करने के अधिकार की मान्यता तथा पिछड़े हुए राष्ट्रों का विकास एक निष्पक्ष अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरण द्वारा किया जाना पंचशील सिद्धांत के आधार पर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना को सर्वोपरि बनाना है।
  • भारत की विदश नीति के तहत साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद पर रोक लगाना है। भारत अपनी विदेश नीति निर्माण सिद्धांतों में कभी भी साम्राज्य विस्तार और पराधीनता के विरोध में रहा है।
  • भारत के समक्ष आये अंतर्राष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से निपटने में विश्वास रखता है। अतः इसी धारणा के आधार पर भारत आज संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का हिस्सा है। इसके साथ ही भारत विश्व शांति को बनाये रखने हेतु निरस्त्रीकरण पर भी अधिक जोर देता है।

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