Indian Economic Slowdown

By Hemant Kumar|Updated : December 12th, 2019

विषय:

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विकास दर 4.5% पर है। यह वर्तमान में छह वर्ष के न्‍यूनतम स्तर पर है। पिछले वर्ष की दूसरी तिमाही में GDP दर 7.1 प्रतिशत थी। यह लगातार सातवीं तिमाही में उत्‍तरोत्‍तर घटती जा रही है।

विभिन्न एजेंसियों द्वारा वर्ष 2019-20 के लिए अलग-अलग GDP पूर्वानुमान आंकड़े निम्नलिखित हैं: 

क्रमांक

संगठन

वित्‍त वर्ष 2019-20 के लिए अनुमानित आंकड़े

1.

RBI (चौथी द्वैमासिक मौद्रिक नीति)

6.1%

2.

विश्‍व बैंक

6%

3.

IMF

6.1%

4.

मूडीज रेटिंग एजेंसी

5.8%

 

भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेतक निम्नलिखित हैं:

  • एक प्रमुख संकेतक कम GDP दर है। यह वर्ष 2013 के बाद से न्‍यूनतम हुई है।
  • ऑटोमोबाइल सेक्‍टर में संकट। भारत में शीर्ष पांच कंपनियों के उत्पादन में 30% की गिरावट हुई है।
  • माल एवं सेवा कर 6,227 करोड़ रुपये कम हुआ।
  • बचत और निवेश दर में कमी।
  • रुपये का मूल्‍य, 72 रुपये पार करके और गिर गया, यह छह वर्ष में सबसे खराब मासिक नुकसान है।
  • पिछले वर्ष की तुलना में औद्योगिक उत्पादन और विनिर्माण गतिविधि में कमी। आठ प्रमुख उद्योगों में उत्पादन जनवरी 2019 में केवल 1.8% की दर से बढ़ा।
  • GDP के प्रतिशत के रूप में सकल स्थिर पूंजी विनिर्माण (GFCF) वित्त वर्ष 2015 के 56% से घटकर वित्त वर्ष 2019 में 36% हो गया।

धीमी विकास दर के कारण:

  • RBI के अनुसार, मंदी संरचनात्मक के बजाय चक्रीय है।
  • यात्री वाहनों की मांग में मंदी, बढ़ती ईंधन कीमतों, उच्च ब्याज दर और ऋण अनुपलब्धता के कारण ऑटोमोबाइल सेक्‍टर में संकट।
  • उपभोक्ता मांग में भारी गिरावट है।
  • उच्च बेरोजगारी दर के कारण लोग बिना किसी आय स्रोत के हैं।
  • विमुद्रीकरण ने नकदी आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है।
  • GST की शुरूआत जैसे संरचनात्मक सुधारों से राजस्व संग्रह में गिरावट आई है। लघु उद्योगों को अपना रिटर्न दाखिल करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
  • बढ़े हुए NPA, छह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के खिलाफ प्रॉम्‍प्‍ट करेक्‍टिव एक्‍शन के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के ऋणों ने अधिक प्रभावित किया है।
  • IL&FS में गिरावट के बाद NBFC के कमजोर पड़ने से चलनिधि संकट बढ़ा है।
  • रियल एस्‍टेट, विनिर्माण और अवसंरचना उद्योग गहरे संकट में हैं।
  • कमजोर वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार युद्ध का माहौल।
  • बढ़ती निवेश लागत, उपज की कम कीमतों और सार्वजनिक निवेश में कमी के कारण कृषि विकास में गिरावट।

अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम:

  • घरेलू कंपनियों के लिए कंपनी कर (कॉर्पोरेट टैक्स) की दर बिना अधिभार और उपकर के 30% से घटाकर 22% और अधिभार एवं उपकर सहित 35% से घटाकर 25% कर दी गई। प्रभावी कर की दर घटकर 25.17% रह गई है।
  • चलनिधि बढ़ाने के लिए 70000 करोड़ रुपये बैंकों में डालकर बैंकों का पुनर्पूंजीकरण।
  • RBI ने समग्र ऋण मांग बढ़ाने के लिए पिछले नौ महीनों में रेपो दर को 135 आधार अंक घटा दिया। हालांकि, यह बैंकों द्वारा 29 आधार अंकों की कमी के साथ परिवर्तित हुई।
  • सरकार ने रियल एस्‍टेट क्षेत्र के लिए एक स्‍पेशल विंडो की घोषणा की है ताकि वह निर्माण गतिविधियों को गति प्रदान करे।
  • निर्यात के लिए प्रोत्साहन राशि और MSME के लिए रियायतों की घोषणा की।
  • विदेशी पोर्टफोलियो और घरेलू निवेशकों पर लगाए गए अधिभार की वापसी।
  • मांग को बढ़ावा देने के लिए सरकार निजी आयकर दर में कटौती करने पर विचार कर रही है।

भविष्‍य में कार्यवाही:

  • अर्थव्यवस्था के मुख्य संचालक सरकारी खर्च, निजी खपत, निवेश और निर्यात हैं जो समग्र मांग को पुनर्जीवित करेंगे।
  • उद्योगों के लिए ऋण: RBI द्वारा ब्याज दरों में कटौती के प्रयासों के बाद भी, बैंकों ने उन्हें ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया है।
  • सरकार को निजी संस्थाओं के बीच विश्वास पैदा करके अर्थव्यवस्था में सकारात्मक भावना को पुनर्जीवित करना चाहिए।
  • निजी निवेश, रोजगार और समग्र मांग को प्रोत्साहित करने में अवसंरचना विकास का कई गुना प्रभाव पड़ेगा।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार: लोगों को मनरेगा जैसी योजनाओं के माध्यम से रोजगार प्रदान करने की आवश्यकता है। ग्रामीण आबादी की खरीद क्षमता को कम करना समय की आवश्‍यकता है।
  • नए APMC अधिनियम को लागू करके, बाजार सुधार, किसानों की आय को दोगुना करना, कृषि और गैर-कृषि आय को बढ़ाकर 70:30 करके कृषि विकास दर बढ़ाना।
  • FDI बढ़ाकर, श्रम सुधार, व्यापार करने में आसानी में सुधार करके।
  • GST संरचना का पुनर्गठन करना, ऑनलाइन रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया को सरल बनाना और इसके बारे में छोटे व्यवसायी को शिक्षित करना।
  • प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में व्यापक कर सुधार।
  • विनिर्माण, निर्यात को बढ़ावा देकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भागीदारी बढ़ाना।
  • नीति आयोग द्वारा अनुशंसित अक्षम और निष्‍क्रिय PSU और PSE का विनिवेश।
  • इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के माध्यम से NPA समाधान की प्रक्रिया को तेज करना।
  • पी.जे.नायक समिति द्वारा सुझाए गए बैंक प्रशासन सुधार।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल प्रशिक्षण में सार्वजनिक निवेश के माध्यम से सामाजिक पूंजी निर्माण।
  • RBI ने विकास के नए चालकों जैसे फिन-टेक और डिजिटलीकरण की पहचान की है, इनको बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • RBI ने IMF के इंटीग्रेटेड पॉलिसी फ्रेमवर्क के कार्यान्वयन का भी सुझाव दिया है जो मौद्रिक दरों, विनिमय दरों, मैक्रोप्रूडेंशियल और पूंजी प्रवाह प्रबंधन नीतियों को एकीकृत करेगा।

2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या किया जाना चाहिए:

  • GDP को अगले पांच वर्षों में औसतन 7.5 प्रतिशत से अधिक तेजी से बढ़ने की आवश्‍यकता है।
  • खरीद क्षमता में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए, मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत पर नियंत्रित करने की आवश्यकता है।
  • आगामी पांच वर्षों में, निश्चित निवेश दर को 29 प्रतिशत से बढ़ाकर 36 प्रतिशत करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष:

भारत को आर्थिक विकास को पुन: व्‍यवस्‍थित करने के लिए बहुविध दृष्टिकोण लागू करना चाहिए। पूंजी बफर स्थापित करने और NPA के प्रभाव को स्थिर करने में सरकार द्वारा किए गए उपायों से निवेशकों में विश्वास बढ़ा है। यह अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

 

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