हरियाणा विशेष: हरियाणा का इतिहास

By Arpit Kumar Jain|Updated : November 29th, 2020

हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए हरियाणा सामान्य ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत से छात्र हरियाणा जीके नोट्स की मांग कर रहे हैं, इसलिए यहां हम एचटीईटी परीक्षा के लिए हरियाणा विशेष सीरीज़ शुरू कर रहे हैं। इस सीरीज़ में, हम हरियाणा राज्य सामान्य ज्ञान से संबंधित सभी महत्वपूर्ण नोट्स को कवर करेंगे।

हरियाणा का इतिहास

प्राचीन भारत:

  • प्राचीन युग में, हरियाणा क्षेत्र में सिन्धु घाटी सभ्यता के कईं स्थल जैसे राखीगढ़ी – सबसे बड़ा आई.वी.सी स्‍थल एवं 5000 वर्षों से भी अधिक पुराने आई.वी.सी के सबसे प्राचीन स्थलों में से एक (हिसार जिला), नौरंगाबाद (भिवानी जिला), मित्ताथल (भिवानी जिला), कुनाल (फतेहाबाद जिला), बनवाली (सिरसा जिला), रुखी (रोहतक जिला) इत्यादि, विशेषकर सरस्वती नदी के किनारों के सहारे पाए गए हैं।
  • कुछ पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि सिन्धु घाटी सभ्यता का उद्गम स्थल राखीगढ़ी हो सकता है जिसे बाद में पश्चिमी दिशा की ओर ले जाया गया।
  • पक्की सड़कों, एक जल-निकास प्रणाली, बड़े पैमाने पर वर्षा जल एकत्रण का संग्रहण, टेराकोटा ईंट एवं प्रतिमा निर्माण एवं कुशल धातु कारीगरी (दोनों कांसे एवं कीमती धातुओं में) का खुलासा किया जा चुका है|
  • वैदिक सभ्यता में 1600 ई.पू. से 600 ई.पू. के बीच यह क्षेत्र केंद्र में नदियों एवं दोआब (doabs) से घिरे हुए थे, चूँकि कृषि एवं स्थायित्व की पद्धति की प्रथा का विकास हो चुका था।
  • प्राचीन वैदिक काल में इस क्षेत्र में ऋग्‍वेद भजन लिखे जाते थे।
  • यह ऐसा स्थान है जहां आर्यों ने अपने पवित्र मन्त्रों का उच्चारण किया था।
  • दक्षिण हरियाणा अनेक वैदिक शास्त्रों का निवास था एवं 10,000 वर्षों पुरानी तिथि के कईं कागजात पाए गए एवं मनु और भृगु नामक दस्तावेज भी प्रलय के समय के जाने जाते हैं।
  • इस क्षेत्र में महाकाव्य महाभारत को संत वेदव्यास द्वारा संस्कृत में लिखा गया।
  • हरियाणा को “बहुधान्यका(Bahudhhanyaka) – भरपूर मात्रा में अनाज की भूमि” एवं “बहुधना (Bahudhana) – महाकाव्य महाभारत में विशाल धन की भूमि” के नाम से भी जाना जाता है।
  • हिन्दू सभ्यता के अनेक प्राचीन ग्रंथों में बताया गया है कि कुरुक्षेत्र की सीमा, हरियाणा राज्य के लगभग समान ही है।
  • महाभारत में बताए जाने वाले हरियाणा के स्थान गुडगाँव- गुरु द्रोणाचार्य का गाँव; सोनप्रस्थ सोनीपत; पंप्रस्थ पानीपत; तिलप्रस्थ तिलपुत; प्रिठुदाका पेहोवा; इत्यादि हैं।
  • पेहोवा, कुरुक्षेत्र, तिलपत एवं पानीपत के क्षेत्रों में मिट्टी के बर्तनों, मूर्तिकला एवं आभूषणों की खोज ने महाभारत के युद्ध के इतिहास को सिद्ध कर दिया।
  • यह वह स्थान है जहां श्रीकृष्ण ने महान अर्जुन को भगवत गीता के उपदेश दिए थे।
  • कुरुक्षेत्र युद्ध जो कि कौरवों एवं पाण्डवों के बीच कुरुक्षेत्र के शहर हस्तिनापुर के राज-सिंहासन के राजा का चयन करने हेतु अठारह दिनों के लिए लड़ा गया था।
  • हिसार के करीब व्यापारियों के शहर अग्रोहा की स्थापना महाराजा अग्रसेन द्वारा की गयी थी। शहर के प्रत्येक अप्रवासी को एक घर बनाने एवं स्व-रोजगार हेतु व्यापार आरम्भ करने के लिए शहर के प्रत्येक निवासी द्वारा एक ईंट और एक रुपया दिया जाता था।
  • मौर्य शासन में यह स्थान एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया और बाद में इस पर विदेशी घुसपैठियों द्वारा विशेषकर कुषाण हेतु आक्रमण किया गया।
  • तीसरी शताब्दी ई.पू. से हर्षवर्धन काल के बाद यह स्थान गुप्त युग में प्रसिद्ध स्थान बन गया।

मध्यकालीन भारत:

  • हरियाणा को “उत्तरी भारत का मुख्य द्वार कहा जाता है चूँकि यहाँ अनेक देशी शासकों एवं आक्रमणकारियों के बीच निर्णायक एवं महत्वपूर्ण युद्ध हुए हैं जिन्होंने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया।
  • जैसे-जैसे वर्ष निकलते गए, हुन, तुर्क एवं अफगान के निरंतर सेनाबल ने भारत पर आक्रमण किए और इस भूमि पर अनेक निर्णायक युद्ध लड़े गए।
  • छठी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य में गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् उत्तरी भारत को दोबारा विभिन्न राज्यों में बांटा गया।
  • हुन ने पंजाब के ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इस काल के बाद प्राचीन भारत के सर्वश्रेष्ठ राजाओं में से एक, हर्षवर्धन ने अपना शासन आरम्भ किया। वह 606 ईसा पूर्व में थानेसर (कुरुक्षेत्र) के राजा बने, और बाद में उत्तरी भारत के अधिकतम क्षेत्र पर शासन किया।
  • 14वीं शताब्दी में, तोमर राजाओं ने इस क्षेत्र के माध्यम से दिल्ली तक एक सेना का नेतृत्व किया।
  • सत्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में रजा हर्षवर्धन ने उनकी राजधानी की कुरुक्षेत्र के समीप थानेसर में स्थापना की। तब से यह क्षेत्र उत्तरी भारतीय शासकों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन गया, हालांकि केंद्र कन्नौज में परिवर्तित हो गया।
  • 12वीं शताब्दी ईसा पूर्व में हंसी एवं तरोरी (Hansi and Taraori) पर राजा पृथ्वीराज चौहान द्वारा किलों की स्थापना की गई।
  • यहाँ तारेन का द्वित्तीय युद्ध वर्ष 1192 में हुआ जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र पर मुहम्मद गोरी को विजय प्राप्त हुई।
  • 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत ने उत्तरी भारत में अपना साम्राज्य स्थापित किया जिसमें विशेषकर हरियाणा को युद्ध नीति-विषयक के रूप में रखा गया।
  • 'हरियाणा' के लिए सबसे पुराना सन्दर्भ संस्कृत में प्राप्त हुआ जो कि 1328 ईसा पूर्व में दिल्ली संग्रहालय (Museum) में रखा हुआ है, जो कि इस क्षेत्र की पृथ्वी पर स्वर्ग के रूप में व्याख्या करता है, जो कि यह दर्शाता है कि यह अत्यधिक उपजाऊ एवं साथ ही शांतिपूर्ण भी हैं।
  • यह क्षेत्र हिसार के एक किले से परिबद्ध था जिसे फ़िरोज़शाह तुगलक द्वारा 1354 में निर्मित करवाया गया था।
  • दिल्ली सल्तनत काल के दौरान अनेक नहरों का निर्माण किया गया, जिन्हें भारत-पारसी भाषाओं में राजवाहस (Rajawahas) कहा जाता है।
  • पानीपत में होने वाले तीन युद्ध, जिन्होंने भारत के इतिहास को बदलकर रख दिया, वे भी इसी क्षेत्र में हुए।
  • पानीपत का प्रथम युद्ध 1526 में हुआ जिसमें केन्द्रीय एशियाई शासक बाबर ने दिल्ली सल्तनत शासक इब्राहीम लोदी को हराया और इस प्रकार भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना हुई।
  • पानीपत के द्वित्तीय युद्ध (5 नवम्बर, 1556) मेंअकबर के जनरल बैरम खान ने हेमू को हराया,
  • 18वीं शताब्दी के मध्यकाल की ओर, हरियाणा पर मराठियों का नियंत्रण था। अहमदशाह दुरान्नी का भारत पर अतिक्रमण, 1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध का कारण बना। इस युद्ध में मराठियों की हार ने उनके प्रभुत्व का अंत और मुग़ल साम्राज्य का पतन किया, इस प्रकार ब्रिटिश शासन का आगमन हुआ।
  • पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 में अफगान के सेनापति अहमदशाह अब्दाली एवं मराठियों के बीच पुणे के सदशिव राव भौ के अधीन लड़ा गया। 13 जनवरी, 1761 को अहमदशाह ने दृढतापूर्वक विजय प्राप्त की।

आधुनिक भारत:

  • ब्रिटिश शासन के दौरान यह क्षेत्र 1857 के महान विद्रोह के मुख्य केन्द्रों में से एक रहा है और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह हेतु जनसमूह को एकत्रित करने एवं केन्द्रीय बल के रूप में कार्यरत रहा है।
  • बाद में, ब्रिटिश सरकार ने भविष्य में होने वाले विद्रोहों को सम्भालने हेतु इस क्षेत्र को रणनीतिक रक्षात्मक स्थान के रूप में घोषित किया है।
  • हरियाणा राज्य से राष्ट्रीय नेता : बाबूदयाल शर्मा, लालाश्याम शर्मा, हीरा सिंह, डॉ. माधाराम इत्यादि।
  • स्वतंत्रता के पश्चात् हरियाणा, पंजाब राज्य का ही एक हिस्सा था। 1965 में हुकम सिंह संसदीय समीति ने हरियाणा राज्य के रूप में हिन्दी वक्ता भाग को पंजाब से अलग करने की सलाह दी थी।
  • 1966 में, भारतीय सरकार ने दो राज्यों के बीच की सीमा तय करने के लिए शाह समीति का गठन किया।
  • शाह समीति की सलाह के आधार पर पंजाब राज्य के कुछ जिले नए राज्य बन चुके हैं जिन्हें हरियाणा कहा जाता है।
  • समृद्ध विरासत एवं आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए हरियाणा एक अलग राज्य बन गया।

धन्यावद

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