पंचवर्षीय योजना: भारत में आर्थिक नियोजन

By Arpit Kumar Jain|Updated : May 24th, 2019

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पंचवर्षीय योजना: भारत में आर्थिक नियोजन

भारत में आर्थिक नियोजन

विश्वेश्वरय्या योजना:

भारत में आर्थिक नियोजन काल की शुरुआत विश्वेश्वरय्या की दस वर्ष की योजना के साथ शुरु हुई थी। श्री एम. विश्वेश्वरय्या ने 1934 में “भारत में आर्थिक नियोजन” शीर्षक से एक पुस्तक प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने दस वर्षों में राष्ट्र की आय दोगुनी करने का मसौदा पेश किया था। उन्होंने श्रम को कृषि पर आधारित हटाकर उद्योग आधारित करने का सुझाव देकर लोकतांत्रिक पूंजीवाद (संयुक्त राज्य अमेरिका के समान) का समर्थन किया था जिसमें औद्योगिकीकरण पर जोर दिया गया। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने इस योजना में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन इसने देश के शिक्षित युवाओं के बीच राष्ट्रीय नियोजन की मांग को सफलतापूर्वक उभारा था।

राष्ट्रीय योजना आयोग (एन.पी.सी.)

यह भारत के लिए राष्ट्रीय योजना विकसित करने का प्रथम प्रयास था जिसकी शुरुआत 1938 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित एन.पी.सी. की स्थापना से हुई थी। हालांकि, विश्व युद्ध II की शुरुआत के कारण, कमेटी की रिपोर्ट्स तैयार नहीं की जा सकी। आखिरकार इसके दस्तावेज 1948-49 में स्वतंत्रता के बाद जारी हुए।

बॉम्बे योजना:

आठ शीर्ष उद्योगपतियों और तकनीकी विशेषज्ञों ने “भारत के लिए आर्थिक विकास की योजना” शीर्षक से एक संक्षिप्त ज्ञापन मसौदा तैयार किया जिसका संपादन पुरुषोत्तम ठाकुरदास ने 1944 में किया। इस मसौदे को “बॉम्बे योजना” के नाम से जाना जाता है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य 15 वर्षों में कृषि क्षेत्र में आउटपुट को दोगुना करना और उद्योग क्षेत्र में वृद्धि को पांच गुना करना था। बॉम्बे योजना का मुख्य सिद्धांत यह था कि अर्थव्यवस्था का विकास बिना सरकारी हस्तक्षेप और विनियमन के नहीं हो सकता है। आधिकारिक रूप से, योजना को कभी स्वीकार नहीं किया गया, इसके सुझावों को भविष्य की आर्थिक योजनाओं में दोहराया गया।

पीपल प्लान:

पीपल प्लान का मसौदा साम्यवादी नेता एम.एन. राय ने 1944 में लाहौर की भारतीय परिसंघ के उत्तर-युद्ध पुर्नसंरचना समिति की ओर से किया गया था। यह मार्क्सवादी समाजवादी पर आधारित था और इसमें कृषि को प्रधानता दी गई। इसने कृषि और सभी उत्पादन गतिविधियों के राष्ट्रीकृत होने पर बल दिया।

गांधी योजना:

गांधी योजना का मसौदा एस.एन. अग्रवाल ने 1944 में वर्धा वाणिज्यिक कॉलेज के सिद्धांत पर तैयार किया था। इस योजना में भारत के लिए ‘आत्म-निर्भर गांवों’ के साथ ‘विक्रेन्द्रीकृत आर्थिक संरचना’ तैयार की गई। एन.पी.सी. और बॉम्बे योजना से इतर, योजना में कृषि पर अधिक बल दिया गया। और जहां भी औद्योगीकरण की बात कही गई वहां सूत और ग्राम स्तर उद्योगों के प्रोत्साहन पर बल दिया गया।

सर्वोदय योजना:

इस योजना का मसौदा जय प्रकाश नारायण ने 1950 में बनाया था। यह गांधी योजना और विनोबा भावे के आत्म-निर्भरता सिद्धांतों पर आधारित था। इसने कृषि के साथ-साथ लघु और कपास उद्योगों पर जोर दिया। इसने विदेशी तकनीक के प्रयोग को कम करके आत्म-निर्भर होने तथा भूमि सुधारों और विक्रेन्द्रीकृत भागीदारी नियोजन लागू करने पर बल दिया।

योजना आयोग:

स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात अखिल भारतीय कांग्रेस समिति द्वारा आर्थिक कार्यक्रम समिति (ई.पी.सी.) गठित की गई। पं. जवाहर लाल नेहरू इसके अध्यक्ष थे। 1948 में, समिति ने योजना आयोग के गठन की सिफारिश की थी। यह एक अतिरिक्त संवैधानिक निकाय है, जिस पर पांच वर्षों के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाने का दायित्व है।

राष्ट्रीय विकास परिषद (एन.डी.सी.)

इसका गठन 6 अगस्त, 1952 को किया गया था। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है। यह भारत में विकास के मुद्दों पर फैसले लेने और चिंतन करने वाला शीर्ष निकाय है। यह भारत की पंचवर्षीय योजनाओं को अंतिम मंजूरी प्रदान करता है।

प्रथम तीन पंचवर्षीय योजनाएं संक्षेप में:

योजनाएं

समय-सीमा

उद्देश्य और टिप्पणी

प्रथम योजना

1951-1956

· ध्यान: कृषि, मूल्य स्थिरता और बुनियादी ढांचा।

· यह होर्राड डोमर मॉडल पर आधारित था (अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर सकारात्मक दृष्टि में पूंजी की उत्पादकता और निवेश दर पर निर्भर करती है)।

द्वितीय योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 4.5%

वास्तविक वृद्धि: 4.27%)

1956-1961

· ध्यान: तेज औद्योगिकीकरण

· इसे महालनोबिस योजना भी कहा गया (नियोजन का ध्यान कृषि से हटाकर उद्योगों पर करने की सलाह दी गई)

· इसने भारी और बुनियादी उद्योगों पर बल दिया।

· इसमें आयात-प्रतिस्थापन की वकालत की, निराशावाद निर्यात और अतिव्यापार आदान-प्रदान।  

तृतीय योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 5.6%

वास्तविक वृद्धि: 2.84%)

1961-1966

· ध्यान: भारी और बुनियादी उद्योग जिसे बाद में कृषि की ओर प्रतिस्थापित कर दिया गया।

· चीन 1962 और पाकिस्तान 1965 दो युद्धों तथा 1965-66 में भयंकर सूखा पड़ा था, यह योजना कईं मोर्चों पर असफल साबित हुई।

1966-67, 1967-68 और 1968-69 तीन वार्षिक योजनाएं थीं। तीन लगातार वर्षों तक पंचवर्षीय योजनाओं को स्थगित करने के कारण इसे योजना अवकाश का समय कहा जाता है। व्यापक खाद्य संकट के कारण, वार्षिक योजनाओं का ध्यान कृषि पर केन्द्रित किया गया। इन योजनाओं के दौरान, हरित क्रांति की नींव रखी गई जिसमें एच.वाई.वी. (उच्च पैदावार किस्मों) बीजों, रासायनिक उवर्रकों के व्यापक प्रयोग और सिंचाई संभावनाओं का बड़े स्तर पर दोहन शामिल था।  इन वर्षों के दौरान, तीसरी पंचवर्षीय योजना के घाटों को झेल लिया गया और 1969 से पंचवर्षीय योजना को क्रमशः आगे बढ़ाया गया।

IV से XII पंचवर्षीय योजनाओं का संक्षिप्त विवरण:

योजना

समय-सीमा

उद्देश्य और टिप्पणी

चौथी योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 5.7%

वास्तविक वृद्धि: 3.30%)

1969-1974

· ध्यान: खाद्य में आत्म-निर्भरता और आत्म-विश्वसनीयता

· इसका लक्ष्य घरेलू खाद्य उत्पादन सुधारना था।

· इसका लक्ष्य विदेशी सहायता लेने से इंकार करना था।

· 1973 का प्रथम तेल संकट, प्रमुख विदेशी विनिमय रिजर्व स्रोतों हेतु प्रेषण जारी किए

पांचवी योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 4.4%

वास्तविक वृद्धि: 4.8%)

 

1974-1979

· ध्यान: गरीबी उन्मूलन और आत्म-निर्भरता प्राप्ति।

· इसे डी.डी. धर द्वारा तैयार और पेश किया गया था।

· इस योजना को 1978 में स्थगित कर दिया गया था।

· वर्ष 1978-79 और 1979-80 के लिए तीन अनवरत योजनाएं (रोलिंग प्लान) चलाई गईं।

छठी योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 5.2%

वास्तविक वृद्धि: 5.4%)

1980-1985

· ध्यान: गरीबी हटाओ और उत्पादकता बढ़ाओ।

· तकनीकी आधुनिकीकरण पर बल दिया गया।

· पहली बार, महात्वाकांक्षी गरीबी हटाओ को अपनाकर गरीबी पर सीधे हमला किया गया (अधोमुखी धन प्रवाह रणनीति को छोड़ा गया)।

सातवीं योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 5.0%

वास्तविक वृद्धि: 6.01%)

1985-1990

· ध्यान: उत्पादकता और कार्य जैसे रोजगार सृजन।

· पहली बार, निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र से ऊपर प्राथमिकता मिली।

· केन्द्र में अस्थिर राजनैतिक स्थितियों के कारण, वर्ष 1990-91 और 1991-92 के लिए दो वार्षिक योजनाएं शुरू की गई।

आठवीं योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 5.6%

वास्तविक वृद्धि: 6.8%)

1992-1997

· ध्यान: मानव संसाधन विकास।

· इस योजना के दौरान, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के साथ नई आर्थिक नीतियों को लाया गया।

· इसने मानव पूंजी और निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दी।

नौवीं योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 7.1%

वास्तविक वृद्धि: 6.8%)

1997-2002

· ध्यान: ‘समता और न्याय के साथ विकास’

·  इसने चार क्षेत्रों पर बल दिया: जीवन गुणवत्ता, उत्पादक रोजगार का सृजन, क्षेत्रीय संतुलन और आत्म-निर्भरता।

दसवीं योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 8.1%

वास्तविक वृद्धि: 7.7%)

2002-2007

1. इसका लक्ष्य अगले 10 वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय को दोगुनी करना था।

2. 2012 तक गरीबी अनुपात को 15% तक घटाना था।

ग्यारहवीं योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 8.1%

वास्तविक वृद्धि: 7.9%)

2007-2012

1. ध्यान: तेज वृद्धि और अधिक समावेशी विकास

बारहवीं योजना

(लक्ष्य वृद्धि: 8%)

2012-2017

1. ध्यान: तेज, अधिक समावेशी विकास और धारणीय विकास।

नीति आयोग

नीति आयोग, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया वर्ष 2015 में भारत सरकार द्वारा स्थापित एक थिंक टैंक है। इसने योजना आयोग का स्थान लिया है। धारणीय विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना और ‘नीचे से ऊपर’ दृष्टिकोण अपनाकर सहयोगी संघवाद को बढ़ावा देना इसके दोहरे लक्ष्य थे। इसकी पहलों में शामिल हैं:
(i) 15 वर्षीय रोड मैप
(ii) 7 वर्षीय सोच, रणनीति और कार्य-योजना
(iii) 3 वर्षीय एजेंडा

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