Farm Bill, 2020- A Detailed Analysis.UPSC GS Paper: III

By Manish Singh|Updated : October 5th, 2020

कृषि विधेयक, 2020- एक विस्तृत विश्लेषण

 

परिचय: 

कृषि विधेयक जो मूल रूप  से (किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और फार्म सेवा समझौता विधेयक) को  केंद्र सरकार द्वारा  मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा(अधिकारिता और संरक्षण) समझौते  नामकअध्यादेश से केंद्र सरकार द्वारा 2020 में पारित  किया गया था। अब सरकार ने हाल ही में इस बिल को पारित कर दिया है,  जो अब क़ानून का रूप ले चुका है। इसलिए इस  कानून से संबंधित  प्रावधानों  को समझने के लिए हमे अध्यादेश के प्रावधानों को समझाना  होगा। इसके अलावा हमे इस विधेयक के प्रावधानों से संबंधित लाभ और हानि को भी समझाना होगा।

कृषि अध्यादेश के प्रमुख बिंदु:

  • यह अध्यादेश किसानों की उपज को अंतर-राज्य और अंतरा -राज्य सीमाओं के व्यापार की अनुमति देता है अर्थात अब भौतिक रूप से एपीएमसी बाजारों में बेचने की बाध्यता नहीं है। यह राज्य सरकारों को किसी भी किसान पर बाजार शुल्क, उपकर या लेवी लगाने से रोकता है अगर वह उस उत्पाद को एपीएमसी मंडी क्षेत्रों से बाहर बेचता है। 
  • फार्मर्स एग्रीमेंट बिल में मूलतः एक रूपरेखा बनाई गयी है जो यह निर्धारित करती है किसी भी किसान और खरीदार के बीच अनुबंध खेती(कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) के नियम पूर्व में निर्धारित कर लीये जाए। यह एक 3-स्तरीय विवाद निपटान तंत्र का निर्माण करता है: इसमें विवाद निपटान बोर्ड, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट और अपीलीय प्राधिकरण होंगे जो एक चैनल के रूप में काम करेंगे।
  • आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 केंद्र सरकार को केवल असाधारण परिस्थितियों (जैसे युद्ध और अकाल और कुछ पूर्वनिर्धारित क्षेत्रों) के तहत दिए गए खाद्य पदार्थों की आपूर्ति को विनियमित करने का अधिकार देता है। कभी-कभी कृषि उपज पर स्टॉक सीमाएं लगाई जा सकती हैं, अगर वहाँ एक स्थिर मूल्य वृद्धि देखी जा रही है। 

 

 अध्यादेश से संबंधित प्रमुख मुद्दे।

  • अध्यादेशों का मुख्य ध्यान किसानों की उपज के लिए खरीदारों की संख्या में वृद्धि करना है, जिससे उन्हें बिना किसी लाइसेंस या किसी स्टॉक सीमा के अपनी उपज का स्वतंत्र रूप से व्यापार करने की अनुमति मिल सके। इससे उनके बीच प्रतिस्पर्धा में वृद्धि होगी जो अंत में किसानों को एक बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मददगार होगा। यह अध्यादेश सरल व्यापार पर केंद्रित है और यह बाजार  में खरीदारों की संख्या बढ़ाता है।
  • इससे पहले कृषि पर गठित की एक स्थायी समिति ने भी इस प्रकार की प्रणाली की मांग की थी जो किसानों के लिए पारिश्रमिक मूल्य सुनिश्चित करती है। अधिकांश किसानों के पास अभी भी सरकारी खरीद सुविधाओं और एपीएमसी बाजारों तक पहुंच नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि छोटे ग्रामीण / उपनगरीय बाजार कृषि विपणन के लिए एक अच्छे विकल्प के रूप में उभर सकते हैं यदि वे पर्याप्त सुविधाओं से लैस हों तो।  
  • इस समिति ने यह भी सिफारिश की कि ग्रामीण कृषि बाजार योजना को पूरी तरह से केंद्रीय योजना द्वारा वित्त पोषित किया जाना चाहिए और देश की प्रत्येक पंचायत में हाट की उपस्थिति सुनिश्चित की जानी चाहिए।

 

एपीएमसी क्या है और एपीएमसी से जुडी समस्याएं:

  • भारत में कृषि बाजार मुख्य रूप से राज्य कृषि उत्पादन विपणन समिति (एपीएमसी) क़ानूनों द्वारा विनियमित होते हैं। 
  • मूल रूप से एपीएमसी की स्थापना का उद्देश्य किसानों की उपज का प्रभावी मूल्य दिलाने  तथा खरीदारों और विक्रेताओं के बीच उचित व्यापार प्रणाली की स्थापना सुनिश्चित करना था।

एपीएमसी का कार्य: 

  1. खरीदारों, कमीशन एजेंटों, और निजी बाजारों को लाइसेंस प्रदान करके किसानों के उत्पादन के व्यापार को विनियमित करना, 
  2. इस तरह के किसी भी व्यापार पर लेवी बाजार शुल्क या किसी अन्य शुल्क को लागू करना। 
  3. कृषि बाजारों में व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा प्रदान करना।

एपीएमसी से संबंधित समस्याएं 

  1. अधिकांश एपीएमसी में ऑपरेटिंग व्यापारियों की एक सीमित संख्या है, जो कार्टेलिज़ेशन को बढ़ावा देती है और प्रतिस्पर्धा को कम करती है।
  2. अनावश्यक कटौती जैसे कमीशन शुल्क और बाजार शुल्क, व्यापारी, कमीशन एजेंट और दलाल  खुद को संगठित कर लेते है जो किसानों का शोषण करते है, जो नए व्यक्तियों को आसानी से बाजार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं देते हैं और बाजार को प्रतिस्पर्धा को मुश्किल बनाते हैं।

यह अधिनियम कैसे कृषि विपणन के विकास को प्रतिबंधित करते हैं: 

  1. अधिक खरीदारों को प्रतिबंधित करके।
  2.  निजी बाजारों को प्रतिबंधित कर के। 
  3. व्यवसायों और खुदरा उपभोक्ताओं की प्रत्यक्ष बिक्री को रोककर।
  4.  ऑनलाइन लेनदेन के प्रचार को रोककर।
  5. इस प्रणाली में प्रतिस्पर्धा का अभाव होता है। 

 

केंद्र सरकार द्वारा लाया गया मॉडल एपीएमसी अधिनियम, जो अनुबंध कृषि को बढ़ावा देता है:

  1. किसानों की उपज के लिए मुक्त व्यापार का निर्माण. 
  2. विभिन्न विपणन मार्गों के माध्यम से प्रतिस्पर्धा में बढ़ोत्तरी, 
  3. पूर्व निर्धारित अनुबंधों के तहत खेती को बढ़ावा देना:

लेकिन केंद्र सरकार ने देखा कि कई राज्यों ने उसके द्वारा सुझाए गए मॉडल अधिनियम के कई सुधारों को लागू नहीं किया है। इसके उपरांत केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के कृषि मंत्रियों की एक समिति का गठन किया ताकि एक अच्छी कृषि विपणन प्रणाली को समाधान के रूप में खोजा जा सके।इसका प्रमुख उद्देश्य था:  

  1. समय-समय पर राज्यों द्वारा मॉडल अधिनियमों को अपनाना और लागू करना, 
  2. कृषि विपणन और बुनियादी ढांचे में निजी पूँजी को आकर्षित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में परिवर्तन (जो उत्पादन, आपूर्ति, और आवश्यक वस्तुओं के व्यापार को नियंत्रित करने से संबंधित  है)।

 

इसके लिए: केंद्र सरकार ने तीन ऑर्डिनेंस पारित किये: 

  1. फार्मर्स प्रॉडक्ट्स ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020। 
  2. फार्मर्स (एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन)  प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एग्रीमेंटऑर्डिनेंस, 2020।
  3. आवश्यक वस्तु(अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2020।

 

इन अध्यादेशों का मुख्य उद्देश्य था: 

  1. विभिन्न राज्यों एपीएमसी क़ानूनों के तहत अधिसूचित बाजारों के बाहर किसानों की उपज को बिना बाधा विपरण करने की  अनुमति देना। 
  2. कॉन्ट्रैक्ट/ अनुबंध फार्मिंग खेती के लिए एक रूपरेखा निर्धारित करना, 
  3. अगर खुदरा मूल्य तेज वृद्धि होती है तो कृषि उपज पर स्टॉक सीमा के अधिकतम स्तर को लागू करना । सभी तीन अध्यादेशों का उद्देश्य किसानों को दीर्घकालिक बिक्री अनुबंधों में प्रवेश करना, खरीदारों की उपलब्धता बढ़ाना और खरीदारों को थोक में कृषि उपज खरीदने की अनुमति प्रदान करने से संबंधित है।

 

इन विभिन्न अध्यादेशों की मुख्य विशेषताएँ:

किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश- 2020:

किसानों की उपज के व्यापार से संबंधित प्रावधान: 

  • यह अध्यादेश किसानों की उपज के अंतर-राज्य और अंतर-राज्य व्यापार को बाहर करने की अनुमति देता है जो है: 
  • बाजार यार्डों का भौतिक परिसर जो राज्य एपीएमसी अधिनियमों के तहत गठित बाजार समितियों द्वारा चलाया जाता था।
  • अन्य बाजार जो राज्य एपीएमसी अधिनियमों के तहत अधिसूचित हैं। यह किसानों के उत्पादन, उत्पादन, संग्रह और एकत्रीकरण का कोई भी स्थान हो सकता है, इसमें निम्न शामिल हो सकते हैं: 
  1. फ़ार्म गेट्स,
  2. फ़ैक्टरी परिसर,
  3. गोदाम, 
  4.  साइलो, 
  5. कोल्ड स्टोरेज।

 

इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग: 

  • इस अध्यादेश किसानों की उपज (कृषि उपज किसी भी राज्य एपीएमसी अधिनियम के तहत विनियमित) जो कि  इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग की अनुमति देते है  निर्दिष्ट व्यापार क्षेत्र से संबंधित है।  
  • इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग का उपयोग कर एक ऐसी  प्रणाली का विकास करना उपज के प्रत्यक्ष / ऑनलाइन खरीद / बिक्री को इंटरनेट के माध्यम से   इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग से सुनिश्चित कर सके।  
  • निम्नलिखित इकाइयाँ जो इस तरह के प्लेटफ़ॉर्म स्थापित और संचालित करने जा रही हैं:
  1. कंपनियां, 
  2. साझेदारी फर्म, 
  3. पंजीकृत सोसायटी, 
  • उनके पास आयकर अधिनियम, 1961 या केंद्र सरकार,द्वारा अधिसूचित किसी अन्य दस्तावेज के तहत स्थायी खाता संख्या होनी चाहिए।
  • किसान उत्पादक संगठनों या कृषि सहकारी समिति भी ऐसा कर सकती है।

 

बाजार शुल्क समाप्त कर दिया गया है: 

  • यह अध्यादेश राज्य सरकारों को मंडी से दूर एक 'बाहरी व्यापार क्षेत्र' में आयोजित किसानों के उत्पाद के किसी भी व्यापार के लिए किसी भी किसान / व्यापारियों / इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर अतिरिक्त करों बाजार शुल्क, उपकर या लेवी लगाने से रोकता है।

 

किसान मूल्य आश्वासन और फार्म सेवा अध्यादेश (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता, अध्यादेश 2020: 

  • कृषि समझौता: 
  1. इसमें फसलों के उत्पादन से पहले एक किसान और एक खरीदार के बीच कृषि समझौता होता है। समझौते की न्यूनतम अवधि एक फसल चक्र  होगा, या यह पशुधन का एक उत्पादन चक्र भी हो सकता है।  
  2. अधिकतम अवधि पांच साल के लिए निर्धारित की जाती है, जब तक कि उत्पादन चक्र पांच साल से अधिक नहीं हो।
  • खेती की उपज: 
  1. कृषि उपज के मूल्य का उल्लेख का मूल्य निर्धारण समझौते में किया जाना चाहिए।  
  2. मूल्य भिन्नता से संबंधित प्रावधान 
  3. उपज के लिए गारंटी मूल्य को किसी भी स्थिति के लिए परिभाषित किया जाना चाहिए अतिरिक्त गारंटी कृत मूल्य से ऊपर की राशि को समझौते में स्पष्ट रूप से परिभाषित कर लिखा जाना चाहिए।  
  4. मूल्य निर्धारण की बाकी प्रक्रिया का भी समझौते में उल्लेख किया जाना चाहिए।
  5. विवाद निपटान तंत्र जो भी परिभाषित किया गया है उसका पालन किया जाना चाहिए: 

 

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 खाद्य पदार्थों का विनियमन और किए गए संबंधित परिवर्तन: 

  • यह आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 केंद्र सरकार को कुछ वस्तुओं को सूचीबद्ध करने का अधिकार देता है जैसे: खाद्य पदार्थ, उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पाद किसी भी उत्पाद जो अचानक बड़े पैमाने पर आवश्यक वस्तु के रूप में उपयोग की जाती हैं।  
  • केंद्र सरकार यदि उपरोक्त वस्तुओं की सुचारु आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहती है तो जब चाहे तब पूर्व-वर्णित आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण, व्यापार, और वाणिज्य को विनियमित या प्रतिबंधित कर सकती है।  
  • केंद्र सरकार द्वारा लाया गया यह अध्यादेश इसे असाधारण परिस्थितियों में केवल दिए गए खाद्य पदार्थों की आपूर्ति को नियंत्रित करने का अधिकार देता है जिसमें अनाज, दालें, आलू, प्याज, खाद्य तिलहन और तेल आदि शामिल हैं: यह आवश्यक परिस्थितियां इस प्रकार है:
  1. युद्ध
  2. अकाल
  3. असाधारण मूल्य वृद्धि
  4. चरम स्थिति की प्राकृतिक आपदा।

 

स्टॉक सीमा का निर्धारण: 

  • अध्यादेश कहता है कि कृषि उत्पादों पर किसी भी भंडारण सीमा का कार्यान्वयन मूल्य वृद्धि की स्थिति पर आधारित होना चाहिए। भंडारण सीमा लागू की जा सकती है जब:
  1. बाग़वानी (पेरिशेबल) उत्पादन के खुदरा मूल्य में 100% वृद्धि देखी गई है।
  2. गैर-खाद्य कृषि खाद्य पदार्थों के खुदरा मूल्य में 50% की वृद्धि।   
  3. इस वृद्धि की गणना मौजूदा मूल्य 12 महीने से अधिक या पिछले 5 साल के औसत खुदरा मूल्य से तुलनात्मक रूप से देखी जाएगी, जो भी कम हो वह मान्य होगी।

 

 

इन फार्म बिलों / अध्यादेश से लाभ और हानि प्राप्तकर्ता 

अब इन अध्यादेशों को अधिनियम के रूप में बनाने के बाद सवाल यह है कि क्या राज्य और उनके  एपीएमसी  इससे प्रभावित हो सकते हैं और सरकारी खरीद के लिए इसका क्या मतलब है?




न्यूनतम समर्थन मूल्य और उससे संबंधित चुनौती क्या है?

  • किसान एमएसपी, या न्यूनतम समर्थन मूल्य को बचाना चाहते है, जो उनके अनुसार नए क़ानूनों से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। वास्तव में एमएसपी पूर्व-परिभाषित मूल्य हैं, जिस पर केंद्र सरकार किसानों से अतिरिक्त उपज खरीदती है।
  • ये कीमतें बाजार दरों से भिन्न हो सकती हैं, और प्रत्येक बुवाई के मौसम की शुरुआत में 23 फसलों के लिए घोषित की जाती हैं। 
  • केंद्र सरकार केवल बड़ी मात्रा में धान, गेहूं और चुनिंदा दालों की खरीद करती है, देश में केवल 6% किसान ही एमएसपी दरों पर अपनी उपज बेचते हैं।
  • शांता कुमार समिति की रिपोर्ट, 2015 के अनुसार जो एनएसएसओ डेटा का उपयोग करके प्रकाशित की गयी थी , यह बताती है कि कोई भी कानून एमएसपी प्रणाली को सीधे क्रॉस चेक नहीं कर सकता। 
  • हालाँकि, राज्यों के अधिकांश सरकारी खरीद केंद्र अधिसूचित एपीएमसी मंडियों के भीतर स्थित हैं जो कि अपने आप में एक मुद्दा है। 
  • किसानों को हमेशा यह डर सताता है कि एपीएमसी मंडियों के बाहर कृषि उपज के कर-मुक्त निजी व्यापार को बढ़ावा देने से  इन मंडियों का कोई फायदा नहीं होगा, जिससे भविष्य में खुद सरकारी खरीद में कमी आ सकती है। किसान यह भी मांग कर रहे हैं कि मंडियों के भीतर और बाहर एमएसपी को सार्वभौमिक बनाया जाना चाहिए, ताकि सरकारी या निजी सभी खरीदारों को इन दरों का उपयोग आधार मूल्य  के रूप में कर सके  जिसके इस मूल्य से नीचे  बिक्री न की जा सके।
  • कुछ राज्यों ने पहले ही एपीएमसी प्रणाली में बहुत अधिक निवेश किया है, एक मजबूत मंडी नेटवर्क के साथ, अरथिया या कमीशन एजेंटों की एक सुव्यवस्थित प्रणाली बनाई है, जो खरीद की सुविधा प्रदान करती है, यह सड़कों के माध्यम से अधिसूचित बाजारों को गांव से जोड़ती है और किसानों को आसानी से अपनी उपज लाने की सहूलियत प्रदान करती है।

 

कुछ अन्य संबंधित मुद्दे?

  • एक अन्य प्रमुख चिंता का विषय यह भी है कि कृषि राज्य सूची का विषय है, इसलिए केंद्र को इस विषय पर बिलकुल भी कानून नहीं बनाना चाहिए, अगर ऐसा होता है यह संघीय ढांचे पर भी असर डालेगा। 
  • राज्यों को मंडी से प्राप्त होने वाले करों और शुल्क से राजस्व के नुकसान के बारे में भी चिंता हैं इससे राज्यों सरकारी खजाने को भारी नुकसान हो सकता हैं।
  • कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पंजाब और राजस्थान दोनों अपने एपीएमसी मंडी यार्ड की सीमा का विस्तार करने के लिए कानूनी उपायों पर विचार कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे अपने राज्य की सीमाओं के भीतर सभी कृषि व्यापार पर कर एकत्र करना जारी रख सकें। 
  • कुछ नए गठित राज्यों ने एपीएमसी मंडियों के लिए नए इन्फ्रा की स्थापना की है, जो इस विकेन्द्रीकृत खरीद प्रणाली के कार्यान्वयन के बाद सभी व्यर्थ हो जाएंगे।

 

निष्कर्ष: 

  • कृषि विपणन का अधिकांश हिस्सा पहले ही मंडी के दायरे से बाहर होता आया है, जिसमें देश भर में केवल 7,000 एपीएमसी बाजार हैं। बिहार, केरल और मणिपुर आदि राज्य एपीएमसी  प्रणाली का पालन नहीं करते हैं। हालांकि, अधिकांश निजी खरीदार वर्तमान में स्थानीय मंडियों में छोटे व्यापारी हैं। 
  • स्टॉक सीमा को हटाने और आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन के माध्यम से थोक खरीद और भंडारण की सुविधा बड़े कॉर्पोरेट खिलाड़ियों को कृषि क्षेत्र में ला सकती है। हालांकि वे बहुत जरूरी  निवेश ला सकते है, वह एक अच्छी प्रतिस्पर्धा का प्रतिनिधित्व कर सकते है जिससे छोटे किसानों को सौदेबाजी की शक्ति में बढ़ोत्तरी होगी और वह किसी हद तक प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर सकते है।




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