भारत में प्रवाल भित्तियाँ : एक परिचय, इनके प्रकार, निर्माण तथा अवस्थिति

By Arpit Kumar Jain|Updated : October 23rd, 2019

 

प्रवाल भित्तियाँ या मूंगा चट्टानें पर्यावरण और जैवविविधता में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट से मूंगा चट्टानों “ग्रेट बैरियर रीफ़” से रंग उड़ने की घटना के बाद से हाल के वर्षों में यह विषय निरंतर चर्चा में रहा है। संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं की तैयारी कर रहे प्रतियोगियों के लिए यह विषय महत्वपूर्ण है। आगामी परीक्षाओं में इनकी सहायता के लिए, हम आपको “भारत में प्रवाल भित्तियाँ : परिचय, प्रकार, निर्माण, अवस्थितियाँ” आदि पर लेख प्रस्तुत कर रहे हैं।

भारत में प्रवाल भित्तियाँ : एक परिचय, इनके प्रकार, निर्माण तथा अवस्थिति

प्रवाल भित्तियाँ

प्रवाल भित्तियाँ वस्तुतः अवसादी चट्टानें होती हैं जोकि महाद्वीपीय मग्नतट और मध्य-महासागरीय पर्वत के सागरीय और महासागरीय तल के ऊपर स्थित होता है। इन जैविक अवसादी चट्टानों का निर्माण प्रवाल जंतुओं के कंकाल के अवसादीकरण, सघन होना, जुड़ने, ठोस बनने की संयुक्त प्रक्रिया से होता है।

प्रवाल जंतु (छोटी मांसल समुद्री एनीमोन जंतु) ऊष्ण और उपोष्ण सागरों तथा महासागरों के समुद्री जीव हैं जो सूक्ष्मजीव पादपों (कवक)-जूज़ैन्थेली के साथ सहजीवी संबंध बनाकर उथले जल में रहते हैं। ज़ूज़ैन्थेली में प्रकाश संश्लेषण क्षमताएँ होती है, जिससे वे प्रवालों को भोजन प्रदान करती है और बदले में प्रवाल ज़ूज़ैन्थेली को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

चूँकि प्रवाल भित्तियों का उद्गम और विकास प्रवाल जंतुओं की सामुद्रिक पारिस्थितिकी से संबंधित है, इसलिए प्रवाल जंतुओं की सामुद्रिक पारिस्थितिकी प्रवाल भित्तियों से जुड़ी स्थितियों का वर्णन करती है।

प्रवाल भित्तियों के लिए अनुकूल पर्यावरणीय स्थितियाँ:

  1. कठोर तल: महाद्वीपीय मग्नतट और मध्य-महासागरीय पर्वत के उप-समुद्री आधार पर कठोर सतह की उपस्थिति। यह कठोर सतह प्रवाल जंतुओं के अलग-अलग कंकाल के अवसादीकरण, सघन होने, जुड़ने, ठोस बनने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
  2. गहराई: उप-समुद्री सतह की गहराई समुद्री स्तर से 80 मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि कवकों को प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए पर्याप्त मात्रा में सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है।
  3. गर्म महासागरीय जलधारा: कोरल जंतुओं का संबंध गर्म महासागरीय जलधारा से है जिसमें अधिक तापमान परिवर्तन नहीं होता है। तापमान लगभग 200 के आसपास होना चाहिए। अतः प्रवाल भित्तियों का महाद्वीपों के पूर्वी तट पर अधिक विस्तार है लेकिन भारत के संदर्भ में यह ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के पूर्वी तट पर काफी तलछट जमा होता है और तलछट प्रवाल भित्तियों की वृद्धि को रोकता है।
  4. अवसाद मुक्त जल: जल को अपेक्षाकृत अवसाद मुक्त होना चाहिए। जल में अधिक मात्रा से तलछट से कोरल जंतुओं के श्वसन में रुकावट आती है और उनकी शीघ्र मृत्यु हो जाती है। इस वजह से, प्रवाल भित्तियाँ भारत के पश्चिमी तट पर प्रमुखता से पायी जाती हैं।
  5. पोषक तत्त्वों की आपूर्ति: पोषक तत्त्वों की आपूर्ति जंतुओं के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करती है। इसलिए, जंतुओं की वृद्धि की दर समुद्र की तरफ अधिक होती है क्योंकि महासागरीय जलधाराऐं पोषक तत्त्वों की पूर्ति में मदद करती है।
  6. सामान्य लवणता: लवणता जंतु के कंकाल के सेहतपूर्ण विकास को सुनिश्चित करती है। प्रवाल जंतु अपने शरीर की सुरक्षा हेतु अपने कंकाल निर्माण के लिए समुद्री जल से कैल्शियम निकालते हैं। इसलिए, प्रवाल जंतुओं के विकास के लिए सामान्य लवणता भी आवश्यक है।

प्रवाल भित्तियों का उदय:

प्रवाल भित्तियों के उदय और विकास की व्याख्या करने वाली अवधारणाओं को व्यापक तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है जिनका यहाँ संक्षेप में वर्णन किया गया है:

  1. अधोगमन अवधारणा (इसे चार्ल्स डार्विन ने दिया था)
  2. ग्लेशियर नियंत्रण अवधारणा (इसे डेली ने दिया था)
  3. स्थिर अवधारणा (इसे मुरे ने दिया था)

प्रवाल भित्तियों के प्रकार और उनका वितरण

  1. फ्रिंजिंग भित्ति: यह भित्तियाँ महाद्वीपीय पर्वत पर बढ़ती और विकसित होती हैं तथा ये तटरेखा से जुड़ी होती हैं।

अवस्थिति: मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह फ्रिंजिंग भित्तियों से जुड़े हैं।

  1. बैरियर भित्ति: बैरियर भित्तियाँ महाद्वीपीय पर्वत के अपतटीय भाग में स्थित होती हैं। ये तट रेखा से दूर और समानान्तर होती हैं। तटरेखा और बैरियर रीफ के बीच लैगून (खारे पानी की झील) स्थित होती है।

अवस्थिति: आस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट के किनारे ग्रेट बैरियर रीफ एक प्रमुख उदाहरण है।

  1. एटॉल भित्ति: एटॉल मध्य-महासागरीय पर्वतों पर स्थित होते हैं। ये वृत्ताकार अथवा दीर्घवृत्ताकार भित्तियाँ होती हैं जो चारों और से समुद्र से घिरी होती हैं तथा केन्द्र में उथली लैगून होती है।

अवस्थिति: मालदीव, लक्षद्वीप आदि।

 

प्रवाल भित्तियों का महत्व:

  1. यह सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का प्रतीक है।
  2. यह सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र में प्राथमिक खाद्य श्रृंखला का स्रोत है।
  3. प्रवाल भित्तियाँ जैवविविधता के एक बड़े जाल को मदद करती हैं। इसलिए, इन्हें सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र का वर्षावन भी कहा जाता है।
  4. ये पर्यटन क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण है तथा निर्माण और हस्तशिल्प कार्य के लिए कच्चे माल का स्रोत होते हैं।

IUCN ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप समूह को HOPE द्वीप (HOPE SPOT) घोषित किया है क्योंकि ये बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

प्रवालों की रंगहीनता:

जब प्रवाल संकट में होते हैं, ये जूजैन्थेली को बाहर निकाल देते हैं और इसलिए सफेद दिखाई देते हैं। आखिर में, भोजन की कमी के कारण प्रवालों की मृत्यु भी हो जाती है।

मानवीय क्रियाओं द्वारा प्रवाल जंतुओं और कवकों के बीच असंतुलित सहजीवी संबंध के कारण प्रवाल भित्तियों का रंग उड़ जाने और सामुद्रिक पारिस्थितिकी तंत्र तथा पारिस्थितिकी पर विपरीत प्रभावों को प्रवाल रंगहीनता कहते हैं।

प्रवाल रंगहीनता के कारक:

  1. वैश्विक ऊष्मन: वैश्विक ताप वृद्धि के कारण महासागरीय जल का बढ़ता तापमान।
  2. महासागरीय अम्लीयता: अम्लीय वर्षा के कारण महासागरीय जल के pH मान में नकारात्मक परिवर्तन और महासागरों द्वारा वातावरण CO2 का अवशोषण।
  3. समुद्री जनसंख्या : बढ़ता समुद्री प्रदूषण और तेल का फैलना
  4. खनन के लिए विस्फोटकों का प्रयोग।
  5. ओज़ोन क्षरण जिससे सौर विकिरण में वृद्धि होती है।
  6. शैवालों का फैलना।
  7. वनों के नाश होने के कारण नदियों से सागरों तथा महासागरों में अवसादीकरण में वृद्धि होती है।
  8. प्रवाल भित्तियों में बीमारियों के कारण भी इनकी उत्तरजीविता के अवसरों पर असर पड़ता है।

समुद्री प्रदूषण का संक्षिप्त विश्लेषण

समुद्री प्रदूषण सामुद्रिक जैवविविधता के लिए खतरनाक है जोकि पृथ्वी की वास्तविक पूंजी है। कुछ कारण और उनके प्रभावों का वर्णन यहाँ किया गया है:

कारण

प्रभाव

कृषि, घरों के नालों में बहते जल का समुद्र में मिलना

जल निकायों में पोषक तत्त्वों की अधिक आपूर्ति के कारण यूट्रोफिकेशन होता है और शैवाल अधिक मात्रा में विकसित होते हैं।

तेल का रिसाव

समुद्री जीवन में सूर्य और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे समुद्री जीवों की मृत्यु होती है और काफी नुकसान होता है।

रिफाइनरी, तेल रिज़र्व आदि से विषैले तत्त्वों को गिराना

समुद्री जीवों में विषाक्तता के कारण जैवआवर्धन होता है और जीवों की समय-पूर्व मृत्यु होती है।

पर्यावरण से CO2 जैसी गैसों का मिलना

महासागरीय लवणता

बैलिस्टिक जल समस्याएँ (नीचे समझाया गया है)

यह जैवविविधता के लिए हानिकारक है (विदेशी प्रजाति के आक्रमण से सर्वाधिक होता है)।

 

बैलिस्टिक जल समस्याएँ

एक देश से दूसरे देश में जहाजों से वस्तुओं के आयात-निर्यात के कारण, जहाजों के साथ लोडिंग और रिलोडिंग संबंधी प्रक्रियाओं में कुछ जल भी आ जाता है। इस जल को बैलास्ट जल कहते हैं। इसमें कई सूक्ष्मजीव और अवसाद होते हैं।

पर्यावरणीय चिंता का विषय: यह जल अपने गंतव्य स्थल पर बिना किसी उचित प्रबंध के छोड़ा जाता है जिसमें जीव होते हैं जोकि उस स्थान और जगह के नहीं होते हैं, जिससे विदेशी आक्रमणकारी प्रजाति का आगमन होता है। उदाहरण के लिए, बम्बई के बंदरगाह पर लोडिंग से न्यूयॉर्क बंदरगाह पर अनलोडिंग से अरब सागर के जीवों का न्यूयॉर्क महासागर के नए पर्यावरण से परिचय होता है जिससे उस पारिस्थितिकी तंत्र को भयंकर नुकसान पहुँच सकता है।

 

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