जलवायु परिवर्तन: प्रस्‍तावना, कारण, प्रभाव और प्रयास

By Brajendra|Updated : October 6th, 2022

जलवायु परिवर्तन का मतलब होता तापमान और मौसम के पैटर्न में दीर्घकालिक परिवर्तन से है। ये परिवर्तन प्राकृतिक हो सकते हैं, जैसे सौर चक्र में परिवर्तन के माध्यम से होता है| जलवायु परिवर्तन (Climate Change) कारणों (प्राकृतिक और मानवजनित), प्रभावों, चिंताओं और प्रयासों के बारे में यहां जानें। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट (Global Risks Report, 2020) के अनुसार अगले दशक में शीर्ष 5 जोखिमों में से सभी जलवायु से संबंधित हो सकते हैं|

जलवायु परिवर्तन: प्रस्‍तावना, कारण, प्रभाव और प्रयास Climate Change Hindi Mein

प्रस्‍तावना

  • संयुक्त राष्‍ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्‍मेलन (यू.एन.एफ.सी.सी.सी.) के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का अर्थ पृथ्वी की जलवायु में होने वाला वह परिवर्तन है जिसके लिए प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से मानव गतिविधियां जिम्मेदार हैं, यह परिवर्तन हमारे वातावरण के संघटन में परिवर्तन कर देता है।
  • स्‍थान और समय के साथ मौसम की स्थितियों में भिन्नताएं और होने वाले आवधिक बदलाव के परिणामस्‍वरूप जलवायु में होने वाले परिवर्तन को जलवायु परिवर्तन के रूप में भी परिभाषित किया जाता है। उदा. जलवायु का गर्म और नम से गर्म और शुष्क में बदलना।
  • यह वैश्विक तापमान और मानव गतिविधियों में वृद्धि के कारण स्थानीय, क्षेत्रीय या वैश्विक वातावरण में होने वाला परिवर्तन है।
  • जलवायु परिवर्तन की दर आकस्मि‍क कारक की गति पर निर्भर करती है।
  • स्थानीय, क्षेत्रीय या वैश्विक स्तर पर जलवायु धीरे-धीरे या तेजी से, आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से, अल्पकालिक या दीर्घकालिक रूप से बदल सकती है, यह आकस्मि‍क कारकों की गति पर निर्भर करता है।
  • जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि जुरासिक काल के दौरान, शीत जलवायु की तीव्र शुरुआत के कारण डायनासोर बड़े पैमाने पर विलुप्त हो गए थे।

विचारणीय क्षेत्र          

  • जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आई.पी.सी.सी.) के एक शोध अध्ययन के अनुसार, मानव गतिविधियों ने वैश्विक तापमान में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से अधिक लगभग 1 ° C (8 ° C से 1.2 ° C) की वृद्धि की है।
  • वर्ष 2030 से वर्ष 2052 के बीच वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है यदि यह वर्तमान दर से बढ़ता रहा।
  • प्राथमिक ग्रीनहाउस गैस (CO2) की वायुमंडलीय सांद्रता पूर्व-औद्योगिक समय में लगभग 280 पी.पी.एम. से बढ़कर 410 पार्ट प्रति मिलियन (पी.पी.एम.) हो गई है।
  • डब्ल्यू.एच.ओ. के एक अनुमान के अनुसार, प्रदूषण से संबंधित समस्याओं के बढ़ने कारण प्रत्‍येक वर्ष लगभग 250,000 लोगों की मृत्यु होती है।
  • गरीब लोग जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित वर्ग होंगे।

जलवायु परिवर्तन के साक्ष्‍य

ये निम्नलिखित साक्ष्‍य हैं जो साबित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है और भविष्य की नीतियों और कार्रवाईयों के लिए इन्‍हें ध्यान में रखा जाना चाहिए: -

  • वैश्विक तापमान में वृद्धि
  • ग्लेशियरों पर आच्‍छादित बर्फ की मात्रा में कमी
  • आर्कटिक समुद्र के बर्फ क्षेत्र में कमी
  • समुद्र के जल का गर्म होना
  • महासागर का बढ़ता समुद्र स्तर
  • दुनिया भर में जंगल की आग की घटनाओं में वृद्धि
  • समुद्री अम्लीकरण के परिणामस्वरूप समुद्री पौधों और जानवरों की मृत्यु होना
  • नियमित अंतराल पर चरम मौसम की घटनाएं होना, जैसे - अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूकंप, सुनामी, तेज़ हवाएँ, ओले, गरज के साथ बारिश, तूफान, जलप्रपात, उष्णकटिबंधीय चक्रवात आदि हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण

जलवायु परिवर्तन के कई कारण हैं। इन्‍हें प्राकृतिक कारणों और मानवजनित कारणों में विभाजित किया जा सकता है:-

जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक कारण

जलवायु परिवर्तन के महत्वपूर्ण प्राकृतिक कारक नीचे दिए गए हैं-

  • महाद्वीपीय बहाव- यह जल निकायों और भूभाग की भौतिक विशेषताओं को बदल देता है, जो भविष्‍य में समुद्र की धाराओं और हवाओं के प्रवाह को बदल देता है।
  • पृथ्वी की कक्षा की भिन्नता में परिवर्तन- यह मिलनकोविच चक्र उत्पन्न करता है, जिसका जलवायु पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और इसका ग्लेशियल और इंटरग्लेशियल अवधियों के साथ एक उल्लेखनीय सहसंबंध है।
  • ज्वालामुखीय गतिविधियों के कारण प्रदूषण- ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान, गैसों और धूल के कणों का प्रकोप सूर्य की आने वाली किरणों को बाधित करता है। इसके अतिरिक्‍त ज्वालामुखियों से उत्पन्न सल्फर डाइऑक्साइड, पानी के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक अम्‍ल की छोटी बूंदों का निर्माण करता है, जो कई वर्षों तक पर्यावरण में रह सकते हैं।
  • प्लेट टेक्टोनिक्स- महाद्वीपों का स्थानांतरण भी महासागरीय धाराओं के प्रारूप को प्रभावित करता है क्यों कि यह महासागरों की ज्यामिति को बदलता है।
  • महासागरीय धाराओं के प्रारूप में परिवर्तन- क्षैतिज हवाओं के परिणामस्वरूप समुद्री सतह के विरुद्ध जल का विस्थापन होता है। यदि यह बदलता है तो यह जलवायु की स्थिति को बदल सकता है।

जलवायु परिवर्तन के मानवजनित कारण

जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले विभिन्न मानवजनित कारक नीचे दिए गए हैं-

  • ग्रीनहाउस गैसों का अत्यधिक उत्सर्जन- यह वायुमंडल में प्रदूषण का कारण बनता है जिसके परिणामस्वरूप जलवायु के प्रारूपों में परिवर्तन होता है।
  • वायुमंडलीय एरोसोल की संघटन में परिवर्तन- एरोसोल, सौर और अवरक्त विकिरण के बिखरने और अवशोषित होने का कारण बनता है। इसके अतिरिक्‍त वे बादलों के सूक्ष्म-भौतिक और रासायनिक गुणों को भी बदल सकते हैं।
  • वनोंन्‍मूलन- पेड़ों और जंगलों के कटने के कारण, जमीन से परावर्तित होकर अंतरिक्ष में लौटने वाले सूर्य के प्रकाश की मात्रा में परिवर्तन हो रहा है, जो जलवायु प्रारूप में परिवर्तन कर रहा है। इसके अतिरिक्‍त वन कार्बन सिंक के रूप में कार्य करता है, यदि यह वनोन्‍मूलन के कारण कम हो जाता है तो यह वायुमंडलीय संघटन में संतुलन को बिगाड़ देगा।
  • प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन- जनसंख्या में वृद्धि और मांग में वृद्धि के कारण प्रकृति का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर जबरदस्त भार है।
  • पर्यावरण की तुलना में औद्योगिकीकरण के लिए नीति प्राथमिकता- औद्योगीकरण की दौड़ में, दुनिया भर की सरकारें अधिक औद्योगीकरण की ओर झुकाव के साथ नीतियां तैयार कर रही हैं। पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
  • CO2 का अत्यधिक उत्सर्जन- वाहन के बढ़ते उपयोग और औद्योगिकीकरण से CO2 का उत्सर्जन बढ़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव (Effects of Climate Change)                

जलवायु स्थिति में भिन्नता के कारण हमारा ग्रह पृथ्‍वी कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कुछ महत्वपूर्ण प्रभाव नीचे दिए गए हैं: -

  • चरम मौसम की घटनाओं का खतरा बढ़ना
  • जंगल की आग का खतरा बढ़ना
  • बाढ़ का खतरा बढ़ना
  • सूखे का खतरा बढ़ना
  • रोग और बीमारी का खतरा बढ़ना
  • चरम मौसमी घटनाओं के कारण आर्थिक नुकसान में वृद्धि होना
  • समुद्र के स्तर में वृद्धि होना
  • वैश्विक तापमान में वृद्धि होना
  • पारिस्थितिकी तंत्र और आर्द्रभूमि के लिए खतरा होना

जलवायु परिवर्तन का सामना करने हेतु भारत का प्रयास

राष्‍ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्यवाही योजना (एन.ए.पी.सी.सी.)

एन.ए.पी.सी.सी. के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने के लिए सरकार ने निम्नलिखित कार्यक्रम शुरू किए हैं:-

  • बिजली उत्पादन के लिए सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सौर मिशन शुरू किया गया है।
  • भारत सरकार ने उद्योगों में ऊर्जा संरक्षण के लिए राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा दक्षता मिशन शुरू किया है।
  • भारत सरकार ने शहरी नियोजन में ऊर्जा दक्षता प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सतत आवास मिशन की शुरुआत की है।
  • मूल्य निर्धारण और अन्य उपायों के माध्यम से पानी के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय जल मिशन शुरू किया गया है।
  • हिमालयी क्षेत्र में जैव विविधता, वन आवरण और अन्य पारिस्थितिक मूल्यों के संरक्षण के लिए हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को सतत बनाए रखने हेतु राष्ट्रीय मिशन शुरू किया गया है।
  • भारत सरकार ने 6 मिलियन हेक्टेयर से अधिक वंचित वन भूमि के वनीकरण और वन क्षेत्र को 23% से बढ़ाकर 33% करने के लिए "ग्रीन इंडिया मिशन" शुरू किया है।
  • जलवायु-लचीली कृषि का समर्थन करने के लिए राष्‍ट्रीय सतत कृषि मिशन शुरू किया गया है।
  • मरूस्‍थलीकरण से निपटने हेतु संयुक्त राष्ट्र सम्‍मेलन (UNCCD) के माध्यम से, भारत ने मरुस्थलीकरण से निपटने हेतु 20 वर्ष की राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की है।
  • पर्यावरण पर उद्योगों के प्रभाव को मापने के लिए भारत सरकार द्वारा पर्यावरण प्रभाव मूल्‍यांकन कार्यक्रम शुरू किया गया है।
  • वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के बेहतर संरक्षण हेतु पारिस्थितिक-संवेदनशील क्षेत्रों को अधिसूचित किया गया है।
  • भारत, अक्षय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है।
  • भारत, पर्यावरण के संरक्षण के लिए विभिन्न नीतियां बना रहा है जैसे- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 आदि।

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